“ज़हर के सौदागर और एक अकेली लड़ाई”
(धीमा, भारी संगीत — सुबह का धुंधलका, खाली सड़कें)
वॉइस ओवर:
कुछ लड़ाइयाँ नारे लगाकर नहीं लड़ी जातीं।
वे चुपचाप लड़ी जाती हैं…
अपने समय, अपने रिश्तों और अपनी सुरक्षा को दाँव पर लगाकर।
मैं भी चुपचाप लगा हुआ था।
मेरी संस्था—एडॉन—मेरे लिए कोई नाम नहीं थी,
वह उन घरों की आख़िरी उम्मीद थी
जहाँ हर रात माँ की नींद बेटे की साँसों पर टिकी रहती थी।
(कट—नशे में डूबे युवाओं की धुंधली परछाइयाँ)
मेरे मन में एक ही जुनून था—
हेरोइन, चिट्टे के आदी
नौजवानों और नवयुवतियों को
इस ज़हर से बाहर निकालना।
दिन-रात बस यही—
नए बीमारों को ढूँढना,
काउंसलिंग करना,
उन्हें यह यक़ीन दिलाना कि
तुम अपराधी नहीं हो, तुम बीमार हो।
(पुराने ठीक हो चुके युवाओं के चेहरे)
इस लड़ाई में
वे साथ थे
जो कभी खुद इस अंधेरे में फँसे थे।
आज वही हाथ बढ़ाते थे,
क्योंकि वे जानते थे—
नशे से बाहर आने का रास्ता
कितना अकेला और डरावना होता है।
(माता-पिता के चेहरे, राहत की साँस)
धीरे-धीरे
लोगों का भरोसा बढ़ा।
माता-पिता की आँखों में
सुकून लौटने लगा।
और शायद…
यहीं से किसी को डर लगने लगा।
(संगीत अचानक रुकता है)
एक दिन सूचना मिली—
एक घर में
चिट्टे की बड़ी खेप है।
मैंने भी वही किया
जो एक जिम्मेदार नागरिक करता है।
पुलिस अधीक्षक को फोन किया।
जवाब मिला—
“स्पेशल टीम भेजी जा रही है।”
(घड़ी की टिक-टिक, लंबी खामोशी)
टीम…
कभी नहीं आई।
(भीड़, तनाव)
सुधरे हुए नौजवान
खुद खड़े हो गए।
घर का घेराव हुआ।
बहुत देर बाद
स्थानीय पुलिस आई।
घर के अंदर
चिट्टा भारी मात्रा में बरामद हुआ।
(फोन की घंटी — एक पल का सन्नाटा)
और फिर…
एक फोन आया।
(संगीत टूटता है)
मात्रा कम तौल दी गई।
धाराएँ हल्की कर दी गईं।
और नशा तस्कर—
थाने से ही
ज़मानत पर रिहा कर दिया गया।
(धीमी, भारी आवाज़)
जब हमने विरोध किया,
तो जवाब में
सच नहीं—
एक साज़िश मिली।
तस्कर की पत्नी को
मोहरा बनाया गया।
मुझ पर
छेड़छाड़ और मारपीट का केस।
धारा 354 आईपीसी
मगर
मैं रुका नहीं।
संस्था का काम चलता रहा।
लेकिन कुछ समय बाद—
एक और नौजवान को बचाने की कोशिश में
हल्की मारपीट हुई।
और मुझे फिर से
उसी केस में
जबरन घसीट लिया गया।
सब कुछ
एक ही नेता की वजह से।
जिसे यह लड़ाई
नागवार गुजर रही थी।
(घर की तलाशी, पुलिस के बूट)
मेरे घर की तलाशी ली गई।
मेरे साथ ऐसा व्यवहार हुआ
मानो मैं समाज का दुश्मन हूँ।
जबकि सच यह था—
मैं उस समाज के लिए खतरा बन चुका था
जो नशे से
ताक़त और पैसा कमाता है।
(अब माहौल और भारी)
और फिर…
मौतें शुरू हो गईं।
ओवरडोज़।
एक के बाद एक।
किसी घर में बेटा,
किसी घर में बेटी।
एम्बुलेंस से पहले
खबर पहुँच जाती थी।
(माँ की रोती हुई आवाज़)
अब सवाल यह नहीं है
कि वे बच्चे क्यों मरे।
सवाल यह है—
जब ज़हर सामने था,
तो उसे जाने किसने दिया?
(धीमे स्वर में)
इन मौतों का
कोई अकेला कातिल नहीं।
यह एक पूरी श्रृंखला है—
नशा तस्कर,
राजनीतिक संरक्षण,
प्रशासन की चुप्पी,
और ईमानदार आवाज़ों को कुचलने की कोशिश।
और बीच में—
वे माता-पिता,
जिनकी ज़िंदगी
हमेशा के लिए
ओवरडोज़ हो गई।
(संगीत थोड़ा बदलता है—उम्मीद की हल्की धुन)
लेकिन कहानी
यहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि समाधान
अब भी मौजूद है।
नशेड़ी अपराधी नहीं—
मरीज़ है।
इलाज चाहिए, सज़ा नहीं।
परिवार को डर नहीं—
सहारा चाहिए।
और सिस्टम को—
राजनीति से आज़ादी।
सामाजिक कार्यकर्ताओं को
सुरक्षा चाहिए,
ताकि अगला कोई
सच बोलने से डरे नहीं।
(अंतिम दृश्य—सूना कमरा, दीवार पर बच्चों की तस्वीरें)
वॉइस ओवर (भारी लेकिन स्थिर):
जो नेता नशे को बचाते हैं,
वे सिर्फ़ तस्करों के नहीं—
मौतों के भी संरक्षक होते हैं।
और जो चुप रहते हैं,
वे भी इस ज़हर में
अपना हिस्सा मिला देते हैं।
(स्क्रीन पर टेक्स्ट)
“यह कहानी किसी एक आदमी की नहीं,
यह उस समाज की है
जो तय करेगा—
वह ज़हर के साथ खड़ा होगा
या ज़िंदगी के साथ।”
(संगीत समाप्त)