आँखों से उठते धुएँ को क्या समझूँ क्या आँकूं मैं
तेरे दिल की खिड़की बँद है, कैसे भीतर झाँकूं मैं
इस राह पर चलूँ तो कीचड़, दूजे पर है फैली ग़र्द
होऊँ दल-दल से तलमल या कि धूल ही फाँकूं मैं
किरदार मेरे पे करके उँगली मुझको उकसाता है
गिरेबाँ नही अब तो तेरा पूरा लिबास ही चाकूं मैं
इश्क तेरे की ख़ातिर दिन रात कवायद करता हूँ
तुझको ही जब कदर नहीं क्यूं दौडूँ क्यों हाँफूं मैं
हुस्न तेरे का कायल हूँ तीर-ए-नज़र से घायल हूँ
जो समझना है समझो पर कौड़ी दूर की हाँकूं मैं
.. मनोज मैहता