Friday, 30 September 2016

क्या....

आँखों से उठते धुएँ को क्या समझूँ क्या आँकूं मैं
तेरे दिल की खिड़की बँद है, कैसे भीतर झाँकूं मैं

इस राह पर चलूँ तो कीचड़, दूजे पर है फैली ग़र्द
होऊँ दल-दल से तलमल या कि धूल ही फाँकूं मैं

किरदार मेरे पे करके उँगली मुझको उकसाता है
गिरेबाँ नही अब तो तेरा पूरा लिबास ही चाकूं मैं

इश्क तेरे की ख़ातिर दिन रात कवायद करता हूँ
तुझको ही जब कदर नहीं क्यूं दौडूँ क्यों हाँफूं मैं
                                           
हुस्न तेरे का कायल हूँ  तीर-ए-नज़र से घायल हूँ
जो समझना है समझो पर कौड़ी दूर की हाँकूं मैं
                                            .. मनोज मैहता

Tuesday, 27 September 2016

ह़टी जवानी आई नीं...! !!

उह़िंयाँ तां बड़ा मितर बणदा, यारी अपण नभ़ाई नीं
तेरी भ़ूरी म़ैह़ सूई जाह़लु बोह़ल़ी तैं मेयां खोआई नीं

सौ बारी मिन्नतीं कित्तियाँ, अपणियां सगँदीं दित्तियाँ
तिसादे मुँड्डे जूँ नीं रेंगी, मदरोट सैह़ मिलणां आई नीं

बड़ेयाँ साल्लां बाद जे मिल्ले तार दिले दे ह़ोये ढिल्ले
ह़ाखीं ने तां मिल्लिया हाखीं, मैरह़मी तिन्नें कढाई नी

उँघ़ें नें उह़िंयाँ रेड्डे गया मैं मुन्नुएँ दा भ़ी पुक्कु लेया मैं
अपणं तिन्नें नदिख्खा कित्ता रती भ़ी मेयो कल़ाई नीं

बीड़िया पर बीड़ी लाँद्दा, डाठ्ठीं लग्गया दिख कल़ाँद्दा
दूँ ह़ीं कदमा साह़ फुल्ली चलदा, ह़ुँदी चढ़ी चढ़ाई नीं
                                               
ह़ुण पिंड्डा ढल़ना लग्गया, कजो जोरे दसणां लग्गया
गप्प एह़ मेया गठ्ठी लैह़ बह़न्नी, ह़टी जवानी आई नीं
                                                .. मनोज मैहता

Monday, 26 September 2016

मैं....!!

नहीं किसी सलोने बुत सा बिक गया हूँ मैं
मील के पत्थर की मानिद टिक गया हूँ मैं

जिनको नहीं परवाह, उनकी बात छोड़िये
है जिन्हें मेरी ज़रूरत उन्हें दिख गया हूँ मैं

मुसीबत में साथ देना ही मेरी है ख़ासियत
न समझिये कि साथ ही चिपक गया हूँ मैं

मेरी शख़्सियत को यूँ हल्के में  न लीजिये
ख़तरनाक हूँ जब कभी  बिदक गया हूँ मैं

कलम में कौमों को  बदलने की है ताक़त
उसी कलम से जाने  क्या लिख गया हूँ मैं
                                   .. मनोज मैहता

Tuesday, 20 September 2016

संभलो जाओ......!!

हमारा नहीं ख़ुद का ही सब कुछ बिगाड़ लेंगे
तय है कि ये सरफिरे काश्मीर को उजाड़ देंगे

पैगबंरों की नेक बातों के  बदल डाले मतलब
एक दिन ये लोग  इस्लाम को ग़र्त में गाढ़ देंगे

ख़ुदा से  उलट खुद करते, कहते हमें काफ़िर
लहू से  रँग डाली सारी, अब कुर्रान फाड़ देंगे

कुछ समझो अंधे बहरो,  इस बात पे तो ठहरो
सैलानियों के बिना तुम्हें क्या झीलें पहाड़ देंगे

पाक के नापाक किस्से ग़म आयेंगे तेरे हिस्से
ग़र ज़िद पे आये हिंदी तो सीनों को फाड़ देंगे
                                        .. मनोज मैहता

Tuesday, 13 September 2016

जय कांग्रेस ....!!

हम गर्व से कहते हैं कि हमने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य होने के नाते यह शपथ ली है कि हम धर्म संप्रदाय व जातिपाति में विश्वास नहीं रखेंगे व इस कसौटी पर पूरा उतरने की कोशिश भी करते हैं| कुछ लोगों का कार्य सिर्फ जाति के नाम पर राजनीति करना है और हमें उनसे यह शिकवा भी नहीं कि वे ऐसा क्यों करते हैं | आज भी कोई ऐसी बैठक हुई होगी जिसकी कोई बड़ी चर्चा हमने तो सुनी नहीं | पर कहीं ये अफवाह उड़ते उड़ते पहुँची कि किसी बैठक में दो जातियों में दरार पैदा करने केपर्चे बँटे व उसके बाद उसी सभा में कुछ बहुत ही लछेदार पर्चे भी किसी नें बांट दिये, किसी फेसबुक चैनल की रिपोर्ट कोई मुझे भी पढ़ा गया| अब यह तो मेजबानों की जिम्मेवारी बनती थी कि इसका पता लगाते या शांत करवाते | पर सुना है जाते जाते रंगीन पर्चों पर बड़ी चर्चा होती रही| पता चला कि पर्चे वहीं पर मौजूद लोग बंटवाते रहे और कोई दलीलें दे रहा है कि हमने वहां से भगा दिया ओहो..!! इतनी बड़ी सभा थी सात आठ सौ लोगों की अगर पर्चे बांटने वाले बाहरी व्यक्ति होते तो पकड़े न जाते क्या ???? छोड़िये... जनता जानती है कि उनका हितैषी कौन है... किसी के कहने से या लिखने से कुछ नहीं होता ||

Monday, 12 September 2016

ईद मुबारक हो

अल्लाह का हरेक हुक़्म हर दीद मुबारक हो
सब ख़ुदा के बंदों को बकर- ईद मुबारक हो
उसकी रज़ा से बियावाँ में ज़िदगी पनपनी थी
इम्तिहां इब्राहिम का सब उसकी ही करनी थी
हजर और इस्माईल को जब रेत पर छोड़ा था
भारी मन से इब्राहिम तब पच्छम को दौड़ा था
उसके तिलस्म से सब ही कुछ जब नष्ट हुआ
भूखप्यास से बेटा बिलखे माँ को भारी कष्ट हुआ
अलसफ़ा अलमरवाह पर मारी मारी फिरती थी
बेटे के जीवन की ख़ातिर उठ उठ के गिरती थी
फरिश्ता ज़िबरैल तब मक्का में आ बिराजा था
उसका आना अल्लाह की मर्ज़ी का तकाज़ा था
अपने हाथ के प्रहारों से वो पत्थरों पर टूट पड़ा
मीठे पानी का तब कुआँ-ए-ज़मज़म फूट पड़ा
इब्राहिम, हजर, इस्माईल की सच्ची कहानी है
शैतान को ग़र भूल जायें तब तो यह बेमानी है
जब जब भी शैतान नें इब्राहिम को बहकाया है
साफ़ पाक इब्राहिम से पत्थर ही तब खाया है
अल्लाह के आदेश से बेटे पे हथियार उठाया था
बेटा तो जीवित रहा, कटा हुआ मेमना पाया था
उसी अल्लाह के रसूल से क़ाबा फिर बनाया था
और तब ही इस्माईल नें नुबुव्वाही को पाया था
इंसानियत का पाठ है ये आओ तुम सब पढ़ लो
इस मुबारक मौके पे, हँस हँस के सज़दा कर लो

Friday, 9 September 2016

हा हाहाहाहा हा हा

दिमाग में कैसा  कीड़ा है
उसके बनने की  चिंता है
उसके बनने की  पीड़ा है
किसी तरह  उसको रोकें
या  पीठ में  खँजर  घोंपें
बस ये ही लगी क्रीडा है
तू जब  इतना  रो रहा है
दिल्ली में कुछ हो रहा है ??

जाग उठे हैं हम

जाकर अब लो छिप गया शिमला के गलियारों में
जिसका नाम है सबसे ऊपर काँगड़ा के गद्दारों में
हित हमारे जिन्होने बेचे  अपनी कुर्सी की ख़ातिर
है इसका भी कुनबा शामिल उन्ह चंद परिवारों में
उसकी लाश को  कुत्ते भी  मुँह तक नहीं लगायेंगे
जिसनें माँ  की इज्ज़त बेची  सरे आम बाजारों में
गाय के बच्चे जाग उठे हैं  तू  चुपके से दुबका रह
ख़ून  के झौंके बह रहे हैं, अब उनकी ललकारों में
साज़िशें और मुँहफट बोल  बनेंगे तेरे गले में ढोल
ताँडव का संगीत तू सुन ले  हवाओं और ब्यारों में
नया वक्त है  नया दौर,  उगने ही वाली है नई भौर
ताज़ा कोंपलें हैं उग आईं त्रिगर्त के चील दयारो में
मेरी धरती का इक दीपक  सूरज सा है चमक रहा
उसने खलबली ला दी है काले स्याह अंधियारों में
ऐ 'बाली' नाम के कारीगर, उठा छैनियाँ और सँदर
चंद पत्थर नये लगाने हैं,  इन ढहती हुई दीवारों में

Wednesday, 7 September 2016

बैनमोर

इक पता नहीं कौन  मित्रो,  बैनमोर में रहता है
है तो सी.पी.एस.  ख़ुद को  मिनिस्टर कहता है
कोई उसे समझा तो दो  इतनी बात बता तो दो
कैबिनेट के बाद राज्य व डिप्टी मन्त्री आता है
थोड़े वक्त की बात है आगे घोर अन्धेरी रात है
तब ही हर कोई उसकी बात में हँसता रहता है

लीजिये हुज़ूर...

जब कहीं भाँग  नहीं मिल थी  आप बड़ा छटपटाये थे
सुना है तब  चरस पीनें  आप मेरे साले के पास आयेथे
उसी ने तब मेरे  परिवार के  सभी भेद तुम्हे बतलाये थे
तीन बार  आपके पापा  भी  यार जुआ खेलने आये थे
मेरे  पिता जी शराब बेचते हैं  एक छोटी  सी दुकान में
तभी मिला है अध्यापन का राष्ट्रीय पुरस्कार सम्मान में
हाँ मेरे  दादा जी का हुआ  जेलों में बहुत ही तिरस्कार
इसलिये इँदिरा गाँधी जी नें दिया था ताम्रपत्र पुरस्कार
मेरे साले साब का न जानें  अब जी मैनें क्या करना है
कहता  है मैंने भी एक  सी पी एस  की तरह बनना है
                     हा हा हाहाहाहा हा हा

झूठ

लोग इत्मीनान से आपकी मानसिकता देख रहे हैं
यह भी विदित है उनको, आप कितनी फैंक रहे हैं
पूर्व सांसद के बिगडैल पुत्र, हम को यह बतलाईये
अध्यापिका  का नाम भी अब सब के आगे लाईये
बैंगलोर कोई  बहुत दूर नहीं  चलिये  चल पड़ते हैं
एक कोई सुबूत या प्रमाण  जनता को  दिखलाईये
ख़ैर छोड़िये चलिये जी हिमाचल सदन ही चलते हैं
'जानू' सपरिवार कब ठहरे थे, डेट तो निकलवाईये
आई आई सी के मेंम्बर  हैं वे तो वहां  ठहरते हैं जी
उसके मेंबर बन नहीं सकते आप तो मत झल्लाईये
ड्रग्स के नशे में धुत होके मनघडँत लिखते हो आप
यह झूठ का चैनल जी, फेसबुक  पर  मत चलाईये
उम्र से दिखते बड़े हैं आप पर  हैं शैतान से बालक
यह अपना पोगो चैनल अपनें गुर्गों को ही दिखाईये

Tuesday, 6 September 2016

हा हा हाहाहाहा हा हा

मत सोच कि समझ़ाई जा दा
तिज्जो मेया भल़काई जा दा
तैं नरक बणाई दित्ता  ज्वाल़ी
सैह़़ 'नगरोटे'  चमकाई जा दा
तेरे  मनें च  जित्तणा  ह़ै कूड़ा
बाह़र  मैं  सारा कढाई जा दा
कोई  नीं सुणांदा  मुआ गप्पाँ
बेह़ला  तू कजो रड़ाई जा दा
बाझी  तूह़लिया  जल़ी मरैं तू
मैं  ऐसी  अग्ग  लगाई जा दा

इकट्ठी  जो  भाँग और  शराब  हो  गई
उनकी  बुद्धि  लो  फिर खराब  हो गई
उनकी  बेहूदगी  व  गीदड़  भभकियाँ
मानों  हमारी  बात  का जवाब हो गई
हमारी  ज़िंदगी  कलंक  का ज्यूं धब्बा
और  ख़ुद  की  खुली  किताब  हो गई
कैसे बहकायेगा काफ़िर तू दुनिया को
तेरे  दुश्मन  की  वो तो शादाब हो गई
बहुत  पागल  है यार मैहता  तू भी तो
तेरे कारण उसकी  नींदें खराब हो गईं

नी भा

राजनीति को बना दिया इसने गाली गलौच का अखाड़ा
अमर्यादित ढँग से लिखता रहता अगाड़ा या पिछवाड़ा
"यत्र  नार्यास्तु  पूजयन्ते  रमयन्ते तत्र देवता" श्लोक को
इस  अधम नीच  ने  प्रिय मित्रो जड़ से ही फैंक उखाड़ा
कांग्रेसी होने के मानी ये नहीं कि हिंदुत्व का निरादर हो
इसी मानसिकता की वज़ह से खूब पिटा हमारा नगाड़ा

Monday, 5 September 2016

Education....

अपनी पढ़ाई का पता नहीं,  दूजे की तालीम बताता है
बात पर बात जो चलती है हर बार ही मुँह की खाता है
एक झूठा इल्ज़ाम छोड़ता तो दूसरा ही नया लगाता है
"जानू" भाई है कितना पढ़ा,आ "मैहता" तुम्हे बताता है
कॉमर्स की +2 क्लास, डी़.ए.वी. काँगड़ा में की ज़नाब
कृपा करके सूफी हालत में, पढ़ना पर मेरा पूरा जवाब
आगे नहीं भी पूछोगे जी तो भी हम तो बतलाते जायेंगे
औछी  हरकतें मत कर प्यारे, यह भी  और समझायेंगे
बैचलर ऑफ होटल मैनेजमैंट किया कॉलेज रमैया से
आस पास ही सुना है , तुम भी कहीं पढ़ते मेरे भैया थे
फर्स्ट क्लास से पास की हैं , उक्त दोनों ही  परीक्शायें
अगर बड़ा ही शौक है तब  सर्टिफिकेट भी दिखलायें ?

Sunday, 4 September 2016

हा हा हाहाहाहा हा हा

हम तो उद्यापनों में व्यस्त हैं
आप जाइये जी मणि-महेश
नन्दी जी से मुआफ़ी माँगना
नहीं तो पीटेंगे जी श्री गणेश
हमारे  काँगड़ा में है  सख्ती
पर करना तुम ढंग से मस्ती
बाबा लोग भी  मिलेंगे तुम्हें
हालत मत करवाना खस्ती

Saturday, 3 September 2016

तेरे  तां मोआ  ढेरे ह़ैन्न मांन्नु
तू  पूरा  कन्ने, तिद्दा  जाह़ंनु
एड्डा तिस्दा खौफ ह़ै तिज्जो
रात्ती भी सुपनें औंदा 'जानु'
तेरी तां ह़ै मोआ ह़ालत देह़ी
ह़ारदा  जाऊँ  पर मैं न मानूं
तैं राकसा क्या बगाड़ना मेरा
तू 'भ़स्मासुर' मैं भ़क्त "ध़्यानु"

हा हा हाहाहाहा हा हा....!!

मुकाबला करते हो तो उसके लिये भी करतूत चाहिये
भैया! इल्ज़ाम लगाने से पहले कोई तो सुबूत चाहिये
जो कहना है कह लो तुम,  हो मगर पूरी कुत्ते की दुम
रब से यह है दुआ भेजा तेरा, सलामत-साबूत चाहिये
जो भी लिखना है लिख, तुझ को  स्वयं जायेगा दिख
मुझे आस है मेरी बात से जगना हर बाली दूत चाहिये

Friday, 2 September 2016

झूठी हैं मुहब्बतें .... !!

छोड़िये जी ख़ुन्नसे छोड़िये भी नफ़रतें
तुमको क्या भाती हैं, अपनी ये हरकते ?

नाकाम हैं कोशिशें, बेपर्दा हुईं साजिशें
काम को ही करते,ये मेहनते मशक्कतें |

खोया है चैन क्यूँ, दिल को क्या है सुकूँ
बदलते से रहते हो,क्यूँ रात भर करवटें ?

उस बियावान में उसके कारण है बहार
तुम भी सींचो ख़ूँ से, पानीं हैं ग़र ज़न्नतें |

ख़ुदा किरदार का करिये ख़ुद मुआइना
शौक से तब डालिये दूसरों पर तोहमतें |

पीले चेहरे न खिले, जोश से यूँ तो मिले
झूठी हैं ये यारियाँ और झूठी हैं मुहब्बतें ||
                               

                                 .. मनोज मैहता

Thursday, 1 September 2016

हा हा हाहाहा हा हा...!!

जड़ा-मड़ा  बोल्ला  दा  मितरा
तू  बड़ा  गँद  घ़ोल़ा  दा मितरा
मैहता  तां  ह़ै  म्या बड्डा ध़ड़छ
तू  चिमचा  बोल्ला  दा  मितरा
एस पी  ह़ोराँ  जे  भ़ँग समटेरी
झ़ूड़याँ तू  फरोला  दा  मितरा
नशे  टूट्टदेयां जिस्म जे तप्पया
पख्खिया मैं झोल्ला दा मितरा
ह़ुण जरा  म्या माह़ंणु बणीं जा
जग रिकार्डे खरोला दा मितरा

हा हाहाहा हा हा...!!

म्ह़ारी  तां  जी  माँ ह़ै  गा
जिसदी नीं सैह़ गोय़े खा
दुध घ़्यो पचदा नीं मितरा
फिरी  तुसां  संगल़ोये खा
300रूपिये सरकारा रख्यो
बांदरां  तुसां  मारी  मुका
जेह़ड़ा नेता ही बणयां बांदर
तिस्दिया पूँछा अग्ग लगा
जेह़ड़े समझे ताल़ी बजा
किह़ले तुसां ज्वाल़ी जा
हा  हा हाहाहाहा हा  हा
हू.  हू.   हू.   हा.  हा हा

आपको किसने रोका है !!

आपको किसनें रोका है  चलकर आगे बढ़ो
राजनैतिक युद्ध है  जरा अँदाज़ से तो लड़ो
ब्राह्मण सिंह लगाते हैं किन परिस्थितियों में
दोस्त! मोहयालों का कभी इतिहास तो पढ़ो
पूरी शिक्षा का जब  आपको सौंपा जिम्मा है
प्राईमरी  के  बच्चों की  मानिंद तो मत लड़ो
तेरे बदनाम करने से,जी मेरा नाम और फैला
तरक्की दूसरे की देखकर इतना तो मत सड़ो
तुम लड़े या वो लड़ा किसी ने क्या लेना है ??
कोई  सुबूत  तो लाओ  फिर आगे बात करो!!

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...