जब कहीं भाँग नहीं मिल थी आप बड़ा छटपटाये थे
सुना है तब चरस पीनें आप मेरे साले के पास आयेथे
उसी ने तब मेरे परिवार के सभी भेद तुम्हे बतलाये थे
तीन बार आपके पापा भी यार जुआ खेलने आये थे
मेरे पिता जी शराब बेचते हैं एक छोटी सी दुकान में
तभी मिला है अध्यापन का राष्ट्रीय पुरस्कार सम्मान में
हाँ मेरे दादा जी का हुआ जेलों में बहुत ही तिरस्कार
इसलिये इँदिरा गाँधी जी नें दिया था ताम्रपत्र पुरस्कार
मेरे साले साब का न जानें अब जी मैनें क्या करना है
कहता है मैंने भी एक सी पी एस की तरह बनना है
हा हा हाहाहाहा हा हा
Wednesday, 7 September 2016
लीजिये हुज़ूर...
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भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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🌺 भृगु-वंश महाकाव्य गान 🌺 नारी-पक्ष बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती, ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती। बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की दे...
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--- ग़ज़ल चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त। किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया, मगर न थमी ...
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