Wednesday, 7 September 2016

लीजिये हुज़ूर...

जब कहीं भाँग  नहीं मिल थी  आप बड़ा छटपटाये थे
सुना है तब  चरस पीनें  आप मेरे साले के पास आयेथे
उसी ने तब मेरे  परिवार के  सभी भेद तुम्हे बतलाये थे
तीन बार  आपके पापा  भी  यार जुआ खेलने आये थे
मेरे  पिता जी शराब बेचते हैं  एक छोटी  सी दुकान में
तभी मिला है अध्यापन का राष्ट्रीय पुरस्कार सम्मान में
हाँ मेरे  दादा जी का हुआ  जेलों में बहुत ही तिरस्कार
इसलिये इँदिरा गाँधी जी नें दिया था ताम्रपत्र पुरस्कार
मेरे साले साब का न जानें  अब जी मैनें क्या करना है
कहता  है मैंने भी एक  सी पी एस  की तरह बनना है
                     हा हा हाहाहाहा हा हा

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