दिमाग में कैसा कीड़ा है
उसके बनने की चिंता है
उसके बनने की पीड़ा है
किसी तरह उसको रोकें
या पीठ में खँजर घोंपें
बस ये ही लगी क्रीडा है
तू जब इतना रो रहा है
दिल्ली में कुछ हो रहा है ??
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
-
🌺 भृगु-वंश महाकाव्य गान 🌺 नारी-पक्ष बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती, ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती। बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की दे...
-
--- ग़ज़ल चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त। किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया, मगर न थमी ...
No comments:
Post a Comment