मत सोच कि समझ़ाई जा दा
तिज्जो मेया भल़काई जा दा
तैं नरक बणाई दित्ता ज्वाल़ी
सैह़़ 'नगरोटे' चमकाई जा दा
तेरे मनें च जित्तणा ह़ै कूड़ा
बाह़र मैं सारा कढाई जा दा
कोई नीं सुणांदा मुआ गप्पाँ
बेह़ला तू कजो रड़ाई जा दा
बाझी तूह़लिया जल़ी मरैं तू
मैं ऐसी अग्ग लगाई जा दा
Tuesday, 6 September 2016
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भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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🌺 भृगु-वंश महाकाव्य गान 🌺 नारी-पक्ष बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती, ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती। बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की दे...
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--- ग़ज़ल चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त। किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया, मगर न थमी ...
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