Friday, 20 February 2026

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे,
आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे।

रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू,
उसके दुश्मन देखना खुद ही बिखर जाएँगे।

वक़्त   रचता   रहे  चाहे   लाखों   साज़िशें,
हौसलों   के आगे   तूफ़ाँ  भी  ठहर  जाएँगे।

झूठ  की  उमर भला  कितनी ठहरेगी यहाँ,
सच  के  सूरज  उगे  तो  अँधेरे  डर जाएँगे।

मशाल  खुद्दारी  की  जब  हो  तेरे  हाथ में,
उजाले  राहों  में  खुद-ब-खुद  उतर जाएँगे।

सर  झुकाना  न  जिन्हें  रास कभी आता है,
ऐसे  लोगों  के  आगे  सितम   झर  जाएँगे।

Monday, 2 February 2026

“ज़हर के सौदागर और एक अकेली लड़ाई”

 “ज़हर के सौदागर और एक अकेली लड़ाई”
(धीमा, भारी संगीत — सुबह का धुंधलका, खाली सड़कें)
वॉइस ओवर:
कुछ लड़ाइयाँ नारे लगाकर नहीं लड़ी जातीं।
वे चुपचाप लड़ी जाती हैं…
अपने समय, अपने रिश्तों और अपनी सुरक्षा को दाँव पर लगाकर।
मैं भी चुपचाप लगा हुआ था।
मेरी संस्था—एडॉन—मेरे लिए कोई नाम नहीं थी,
वह उन घरों की आख़िरी उम्मीद थी
जहाँ हर रात माँ की नींद बेटे की साँसों पर टिकी रहती थी।
(कट—नशे में डूबे युवाओं की धुंधली परछाइयाँ)
मेरे मन में एक ही जुनून था—
हेरोइन, चिट्टे के आदी
नौजवानों और नवयुवतियों को
इस ज़हर से बाहर निकालना।
दिन-रात बस यही—
नए बीमारों को ढूँढना,
काउंसलिंग करना,
उन्हें यह यक़ीन दिलाना कि
तुम अपराधी नहीं हो, तुम बीमार हो।
(पुराने ठीक हो चुके युवाओं के चेहरे)
इस लड़ाई में
वे साथ थे
जो कभी खुद इस अंधेरे में फँसे थे।
आज वही हाथ बढ़ाते थे,
क्योंकि वे जानते थे—
नशे से बाहर आने का रास्ता
कितना अकेला और डरावना होता है।
(माता-पिता के चेहरे, राहत की साँस)
धीरे-धीरे
लोगों का भरोसा बढ़ा।
माता-पिता की आँखों में
सुकून लौटने लगा।
और शायद…
यहीं से किसी को डर लगने लगा।
(संगीत अचानक रुकता है)
एक दिन सूचना मिली—
एक घर में
चिट्टे की बड़ी खेप है।
मैंने भी वही किया
जो एक जिम्मेदार नागरिक करता है।
पुलिस अधीक्षक को फोन किया।
जवाब मिला—
“स्पेशल टीम भेजी जा रही है।”
(घड़ी की टिक-टिक, लंबी खामोशी)
टीम…
कभी नहीं आई।
(भीड़, तनाव)
सुधरे हुए नौजवान
खुद खड़े हो गए।
घर का घेराव हुआ।
बहुत देर बाद
स्थानीय पुलिस आई।
घर के अंदर
चिट्टा भारी मात्रा में बरामद हुआ।
(फोन की घंटी — एक पल का सन्नाटा)
और फिर…
एक फोन आया।
(संगीत टूटता है)
मात्रा कम तौल दी गई।
धाराएँ हल्की कर दी गईं।
और नशा तस्कर—
थाने से ही
ज़मानत पर रिहा कर दिया गया।
(धीमी, भारी आवाज़)
जब हमने विरोध किया,
तो जवाब में
सच नहीं—
एक साज़िश मिली।
तस्कर की पत्नी को
मोहरा बनाया गया।
मुझ पर
छेड़छाड़ और मारपीट का केस।
धारा 354 आईपीसी
मगर 
मैं रुका नहीं।
संस्था का काम चलता रहा।
लेकिन कुछ समय बाद—
एक और नौजवान को बचाने की कोशिश में
हल्की मारपीट हुई।
और मुझे फिर से
उसी केस में
जबरन घसीट लिया गया।
सब कुछ
एक ही नेता की वजह से।
जिसे यह लड़ाई
नागवार गुजर रही थी।
(घर की तलाशी, पुलिस के बूट)
मेरे घर की तलाशी ली गई।
मेरे साथ ऐसा व्यवहार हुआ
मानो मैं समाज का दुश्मन हूँ।
जबकि सच यह था—
मैं उस समाज के लिए खतरा बन चुका था
जो नशे से
ताक़त और पैसा कमाता है।
(अब माहौल और भारी)
और फिर…
मौतें शुरू हो गईं।
ओवरडोज़।
एक के बाद एक।
किसी घर में बेटा,
किसी घर में बेटी।
एम्बुलेंस से पहले
खबर पहुँच जाती थी।
(माँ की रोती हुई आवाज़)
अब सवाल यह नहीं है
कि वे बच्चे क्यों मरे।
सवाल यह है—
जब ज़हर सामने था,
तो उसे जाने किसने दिया?
(धीमे स्वर में)
इन मौतों का
कोई अकेला कातिल नहीं।
यह एक पूरी श्रृंखला है—
नशा तस्कर,
राजनीतिक संरक्षण,
प्रशासन की चुप्पी,
और ईमानदार आवाज़ों को कुचलने की कोशिश।
और बीच में—
वे माता-पिता,
जिनकी ज़िंदगी
हमेशा के लिए
ओवरडोज़ हो गई।
(संगीत थोड़ा बदलता है—उम्मीद की हल्की धुन)
लेकिन कहानी
यहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि समाधान
अब भी मौजूद है।
नशेड़ी अपराधी नहीं—
मरीज़ है।
इलाज चाहिए, सज़ा नहीं।
परिवार को डर नहीं—
सहारा चाहिए।
और सिस्टम को—
राजनीति से आज़ादी।
सामाजिक कार्यकर्ताओं को
सुरक्षा चाहिए,
ताकि अगला कोई
सच बोलने से डरे नहीं।
(अंतिम दृश्य—सूना कमरा, दीवार पर बच्चों की तस्वीरें)
वॉइस ओवर (भारी लेकिन स्थिर):
जो नेता नशे को बचाते हैं,
वे सिर्फ़ तस्करों के नहीं—
मौतों के भी संरक्षक होते हैं।
और जो चुप रहते हैं,
वे भी इस ज़हर में
अपना हिस्सा मिला देते हैं।
(स्क्रीन पर टेक्स्ट)
“यह कहानी किसी एक आदमी की नहीं,
यह उस समाज की है
जो तय करेगा—
वह ज़हर के साथ खड़ा होगा
या ज़िंदगी के साथ।”
(संगीत समाप्त)

Saturday, 31 January 2026

अटलांटिस नहीं द्वारिका में है दम


 
अरब सागर की लहरों में, सुनो कोई कहानी,
जहाँ कृष्ण की नगरी डूबी, छोड़ कर अपनी निशानी।
पत्थर की दीवारें, स्तंभ और लंगर सब चुप,
पर ज़मीन पर द्वारिका आज भी जागती, जैसे जीवन का रूप।
दूर पश्चिम में अटलांटिस, प्लेटो द्वारा लिखित कहानी,
अहंकार और शक्ति का पतन, डूब गई पानी में शैतानी।
कोई अवशेष नहीं, केवल चेतावनी की आवाज़,
सभ्यता का नशा उतरा, खो गया उसका राज़।
द्वारिका कहती है: समय की लय में सब विलीन,
अटलांटिस कहता अहंकार का फल है ग़लत और गमगीन।
एक नगरी पावन स्मृति, समुद्र में अपने चिन्ह छोड़ती,
दूसरी कपोल कल्पना, चेतावनी की परछाई पर दौड़ती।
लहरें गाती हैं दोनों के नाम,
एक है आस्था, एक दार्शनिक प्रमाण।
डूबना भी अलग, सीखना भी अलग,
समय की छाया में, दोनों मिलाते हैं रहस्य के क़दम।
अटलांटिस नहीं, द्वारिका में है दम।


Friday, 30 January 2026

मामू

वो जब बोलता है तो मानो इतिहास की परतें खुलती चली जाती हैं,
शब्द नहीं — तप, अनुभव और युगों की यात्राएँ बोलती हैं।
उसकी वाणी में धूल भरे ग्रंथों की गंध है,
और भीतर जलती हुई दीर्घ साधना की लौ।
वो जब बोलता है तो अध्यात्म की शीतल हवा
चहुँओर बहने लगती है,
मन की व्याकुल झील पर
कोई अदृश्य करुणा हाथ फेर जाती है।
वो जब बोलता है तब मन करता है —
क्षण ठहर जाए, समय भी शिष्य बनकर बैठ जाए,
और मैं निस्पंद, निःशब्द, बस सुनता रहूँ।
तिरसठ बसंतों की थकान शरीर पर दिखती है,
कदमों में अब पहले-सी तीव्रता नहीं,
पर मन — अभी भी युवा पर्वत सा अडिग,
बुद्धि — अब भी दीप्त,
हृदय — अभी भी दीपदान।
वो पूर्ण नहीं —
सांसारिक धूल उसके वस्त्रों पर भी है,
मानवीय कमजोरियाँ उसके द्वार भी दस्तक देती हैं,
पर उसके गुण, उसका चिंतन,
उसकी दृष्टि की गहराई — अतुलनीय है।
वो बोलता है तो नानक की करुणा साथ चलती है,
कबीर की निर्भीकता मुस्कुराती है,
तुलसी का समर्पण झुक जाता है,
कालिदास की प्रकृति आँख खोलती है।
रूमी का इश्क़ घूमता है,
बुल्ले शाह की पुकार सुनाई देती है,
ख़्वाजा की दरियादिली,
निज़ामुद्दीन की महक,
शम्स तबरेज़ की अग्नि —
सब उस स्वर में तैरते प्रतीत होते हैं।
बुद्ध की शांति,
सुकरात के प्रश्न,
प्लेटो के स्वप्न,
अरस्तू का तर्क,
शंकर का अद्वैत,
रामानुज की भक्ति —
सब जैसे उसके वाक्यों में आसन जमाते हैं।
नचिकेता का जिज्ञासु साहस,
दधीचि का त्याग,
गुरु अर्जुनदेव का धैर्य,
मीरा की तन्मयता —
क्षण भर को उसके आसपास मंडराते हैं।
वो जब बोलता है —
देह की सीमाएँ पीछे छूट जाती हैं,
विचार आकाश में खुल जाते हैं,
और सुनने वाला
अपने ही भीतर की यात्रा पर निकल पड़ता है।
ऐसे लोग देह से भले क्षीण हो जाएँ,
पर चेतना से — युगों तक अडिग रहते हैं।
देवेन्द्र जम्वाल — तुम्हें प्रणाम।
तुम्हें लोग मामू कहते हैं, और यह नाम केवल संबोधन नहीं,
अपनत्व का एक जीवित प्रतीक है।
परदे का “मामू” बाद में मशहूर हुआ,
डीएवी कॉलेज कांगड़ा के अस्सी के दशक का असली मामू
तो तुम पहले से थे।
तुम हँसी में दर्शन रखते हो,
सरलता में गहराई,
और अपनापन ऐसे बाँटते हो
जैसे यह तुम्हारी जन्मजात पूँजी हो।
तुम रिश्तों की सीमाओं में बँधते नहीं —
मित्र भी हो, मार्गदर्शक भी,
शिक्षक भी, सहयात्री भी,
और कई बार
निर्भीक सच कहने वाले भी।
तुम्हारी उपस्थिति से महफ़िल हल्की हो जाती है,
तुम्हारी बातों से विचार ऊँचे हो जाते हैं,
और तुम्हारी मुस्कान से
अजनबी भी अपना लगने लगता है।
तुम्हें सलाम —
तुम्हारी सादगी को,
तुम्हारी सोच को,
तुम्हारी जीवंत दार्शनिकता को।
सब रिश्तों से ऊपर लगते हो तुम —
दिल से निकला एक ही वाक्य पर्याप्त है —
सलाम मामू… प्रेम और आदर सहित।

बदलोणां लग्गे

होराँ  दियां  गप्पां क्या करिये,  पहाड़िये भी बदलोणां लगे,
बंदरियां-खिंदां च  दड़णें वाले, रजाइयाँ  गद्देयां  टोणां लगे।

गोलूआं मिट्टी कुत्थु सेहू रेहई, अरो कुनी फेरणी हुण दळेई,
ढाई  मुकाई  करी  कच्चियां कंधां, पक्के  लैंटर  पौणां लगे।

न चुल्ही रिहियां न पचोले रेह, न ही लकड़ू रेह न क्यौले रेह,
स्टोवां  दे  बर्नल गे मुक्की, हुण  गैसां पर  भत्त रन्ह़ोणा लगे।

बंगां, परांदू, रिबनां भुल्लियां,  जीन फसाई बडियां फुल्लियां,
बिटियां छोहरू  बणीं के  हंडुन,  जागत कन्नें  चतरोंणां लगे।

ह़ोआ  दे  झोंके  ऐसे झुल्ले,  सांदीं, समुह़त ता मैन्नेयां भुल्ले,
कुणी  पिटणियां  एह चौधऱां,  पैलसां बिच  ब्याह होणां लगे।

नौंआं  जुग  है  नौंइयां गल्लां,  कुत्थु  तोपादा पारुआं डल्लां,
मैह़तेया तू  मोआ  जबरा  होया,  जवान  न्याणे  ह़ोणां  लगे॥
— मनोज मैहता

कौन

चापलूसों से  घिरा  है, ये  उसको  बतलाये  कौन
हम  उसके  हमदर्द हैं, आखिर ये  समझाये कौन

मंज़िल  से  भटक गया,  साज़िशों में अटक गया
जब  निकलना  ही  न चाहे, तो राह पे लाये कौन

उस अनजु की ख़ातिर भिड़ जाता तूफ़ानों से भी
पर  शक  की  बीमारी से, यारों  बाहर लाये कौन

परख  नहीं  अपनों  की, होली जलेगी सपनों की
दिल  में  लगी  आग  को, कहो अब बुझाये कौन

मन  में  है  जो बात, ज़ाहिर कर दे आज की रात
अब  सच  ही  कह दे कि  तुझको भड़काये कौन

गणतंत्र दिवस

अपनी अपनी दौड़ है
लूटने की होड़ है
लहरा दिया है ध्वज
जनता पर है असहज
अधिकारों पर तो जोर है
कर्तव्य लेख हैं महज़
कहने को लोकतंत्र है
लोग पर परतंत्र हैं
ये ऊँची ऊँची कुर्सियां
सब लूटने के यंत्र हैं
सचिवों की प्रधानता
कहां है जी समानता?
जलसों में भीड़ जुट रही
ज़रूरत है लुट रही
दिखावे को देशभक्त हैं
यूँ सत्ता पर आसक्त हैं
मन में हरा या भगवा है
तिरंगे का दिखावा है
जय हिंद का शंखनाद
हमी से छलावा है
मौसम ! गमगीन नीरस है
जी हाँ आज गणतंत्र दिवस है

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...