Friday, 23 October 2015

This passion shall be over

उतर ही जाएगा हुज़ूर छाया जो सुरूर है,
यह बता दीजिए किस बात का गुरूर है ?

यूँ तो चाहवानों की, हमें कोई कमी नही ,
आपकी चाहत की मगर तलब जरूर है।

वहम चँद आपने, हैं जहन में पाले हुए ,
वक्त सँग हट जायेगा बेज़ा जो फ़ितूर है।

तौहीन मेरी करना माना तुम्हारा शौक है ,
आपकी गलती नहीं, दुनिया का दस्तूर है।

आपकी सूरत पर दिल जो मेरा आ गया,
ख़ुद ही बता दीजिए , मेरा क्या कसूर है ?
----------------- मनोज मैहता------------------

Thursday, 22 October 2015

Dussehra...?????

आज फिर दशहरे में रावण को जलते देखा ,
अपनें भीतर भी लेकिन उसको पलते देखा ।

राम बना जो शख्स मर्यादा की मूरत दिखा ,
पर्दे के पीछे ही उसे आँखें गरम करते देखा ।

हर चौराहे पर नज़र आए खरदूषण त्रिसरा ,
हरेक मोड़ पर माँ सीता को बिलखते देखा ।

घर घर में कैकेयी और मँथरा ने डेरा डाला ,
लखन को राम ही के विरोध में चलते देखा ।

भरत खड़ाऊँ की स्वर्ण कीलें हिलाता रहा ,
हनुमान को क्रोध की अग्नि में जलते देखा ।

बँद करिये अब बाँस-ओ बारूद को फूँकना ,
हर किसी को अपने अहम में जलते देखा  ।।

---------------- - मनोज मैहता ------------------

Tuesday, 20 October 2015

Old lady's grief

अज मिये बोबो तिन्नें पाई पल़चाई दित्ती ,
नणाना कन्नें लौकी भ़रौजी लड़ाई दित्ती ।

देया बाभ़ो सारा टब्बर रैह़ंदा था प्यारे ने ,
बड़कें अद्धे अँगणें च तार लोआई दित्ती ।

स्यापा भ़ी जल़या तदुँआ ते लग्गा पौंणां ,
जद्धौकी बिट्टिया दी करी कुड़माई दित्ती ।

त्रिये म्ह़ीनें चुल्ह़ीं लग्ग थिंयाँ करी लियाँ ,
तेरे भ़णोए दी मिये मसें मैं छमाह़ी कित्ती ।

बड़ी बुरी गत मिये, जीणां ह़ोया मुस्कल ,
ह़ुण ता मैं भ़ी जीणें दी चाह़ मुकाई दित्ती।।

---------------- मनोज मैहता -----------------

Friday, 16 October 2015

He kept reading sadness in her eyes

संशय के पहाड़ पर चढ़ता रहा कोई ,
आँखों में मायूसियाँ पढ़ता रहा कोई ।

उसे खुश रखने के लाखों यत्न किये ,
ग़मों के नये किस्से, घड़ता रहा कोई ।

मँजिल के करीब ही राह भटक गया ,
उल्टी दिशा में ताउम्र बढ़ता रहा कोई ।

हालात मेरे ज्यूँ ज्यूँ, यारो सुधरने लगे ,
द्वेष के ताप में यूँही, सड़ता रहा कोई ।

वो बात और धुन का तो पूरा था धनी ,
तभी तो मुकद्दरों से, लड़ता रहा कोई ।।

...............  मनोज  मैहता...............

Thursday, 8 October 2015

Don't spread rumours

जितणें कि रुपियै ह़ैन्न लयँदयों जुआरियाँ ,
तिन्ह़ां ते ता बद्ध मेयो कठेरयो भ़खारियाँ ।

म्ह़ारे क्ल़ेसे दा पेया, चौंह़्नी पास्से चरचा ,
इत्तणें मज्झ़में कद्द़ी, लाये नी मदारियाँ ।

जितणियाँ बझ़ाणें दिया, जुगताँ मैं करदा ,
तितणियाँ करदा सै़ह़ घ़ुल़ाणें दी त्यारियाँ ।

कजो फलाह़ई जा दे, यारो गप्पाँ झ़ूठियाँ ?
मैं ता लुकाइयाँ मेयो, सच्चिंयाँ तम्ह़ारियाँ ।

मेरी इक गप्प कनें, गठ्ठी बह़ंनी लैह़ंनयों ,
घ़ोड़े ते ला़ेई मत करदे, गधे दी सवारियाँ ।।

--------------- मनोज मैहता ----------------

Wednesday, 7 October 2015

Your silences don't pinch me now.

चुभती नहीं अब मुझे, ये तेरी खामोशियाँ ,
और भी काम हैं कुछ और हैं सरगोशियाँ ।

माना इश्क़ का सुरूर रग-रग में छाया था ,
रूखेपन से पर तेरे, टूटी हैं ये मदहोशियाँ ।

बँधा रहा आँचल से,ताज़वानी शख्स जो ,
क्यूँ करे ढली उम्र में, वो जिस्मफ़रोशियाँ ।

चेहरा अपना आईने में, देख ले तू गौर से ,
नज़र तुम्हें भी आयेंगे चँद तो दागो निशाँ ।

किरदार तेरे ने ही, विवश कहने को किया ,
शायद अब न आयें, रिश्तों में गर्मजोशियाँ ।।
--------------- मनोज मैहता -----------------

Monday, 5 October 2015

Sweet winter creeps slowly

सीरदे स्याल़े दी मिट्ठी, ठँड तनें लग्गा दी ,
गायी दी सगन्द मेयो, अग्ग मनें लग्गा दी ।

छड्डी नें गद्धेरनें गद्दी, जोत्तीं लोह़्णां लग्गे,
खीरयाँ ता दुँडुआँ नें शान ध़णें लग्गा दी ।

सूई जे पइयां किछ ध़ारा ध़ारा लोह़ंदियां,
अपणीं ह़ी ह़ाख जल़ी, बुरी थणें लग्गा दी।

पट्टु,कम्बल़,लेह़्फ, बछाणें लग्गे सजणां,
क्याड़िया दी मैल जाई नें सरैह़्णें लग्गा दी।

चणें ता रयोड़ियाँ ह़ुण ख़ुड़ी गईयाँ बोरियाँ,
खरोड़याँ खाणें जो रूह़ बड़ी कनें लग्गा दी ।
-------------------मनोज मैहता ----------------

Thursday, 1 October 2015

To be notorious is also necessary...

घूमिये चाहे जितना मर्ज़ी पर काम भी होना जरूरी है ,
ख़ुदा कसम आादमी का कुछ नाम भी होना ज़रूरी है ।

तरोताज़ा कर तो देती है, इंसान को हर इक नई सुबह,
बोझिल सी इस ज़िंदगी में पर शाम भी होना ज़रूरी है ।

दुनिया के इस बाज़ार में , बिक जानें को मैं भी हूँ तैयार ,
लेकिन मेरी हस्ती का वाज़िब, दाम भी होना ज़रूरी है ।

जा रहा है वोह दिलों का कातिल यूँ लोग सारे कह उठे ,
तब मुझे यह ग़ुमाँ हुआ कि बदनाम भी होना ज़रूरी है ।

ज़हर से भी कड़वे घूँट तो मुझे, सूफीयत नें पिला दिये ,
फिर से लगने लगा कि हाथ मे ज़ाम भी होना ज़रूरी है ।
------------------------मनोज मैहता --------------------------

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...