घूमिये चाहे जितना मर्ज़ी पर काम भी होना जरूरी है ,
ख़ुदा कसम आादमी का कुछ नाम भी होना ज़रूरी है ।
तरोताज़ा कर तो देती है, इंसान को हर इक नई सुबह,
बोझिल सी इस ज़िंदगी में पर शाम भी होना ज़रूरी है ।
दुनिया के इस बाज़ार में , बिक जानें को मैं भी हूँ तैयार ,
लेकिन मेरी हस्ती का वाज़िब, दाम भी होना ज़रूरी है ।
जा रहा है वोह दिलों का कातिल यूँ लोग सारे कह उठे ,
तब मुझे यह ग़ुमाँ हुआ कि बदनाम भी होना ज़रूरी है ।
ज़हर से भी कड़वे घूँट तो मुझे, सूफीयत नें पिला दिये ,
फिर से लगने लगा कि हाथ मे ज़ाम भी होना ज़रूरी है ।
------------------------मनोज मैहता --------------------------
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