भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे,
आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे।
रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू,
उसके दुश्मन देखना खुद ही बिखर जाएँगे।
वक़्त रचता रहे चाहे लाखों साज़िशें,
हौसलों के आगे तूफ़ाँ भी ठहर जाएँगे।
झूठ की उमर भला कितनी ठहरेगी यहाँ,
सच के सूरज उगे तो अँधेरे डर जाएँगे।
मशाल खुद्दारी की जब हो तेरे हाथ में,
उजाले राहों में खुद-ब-खुद उतर जाएँगे।
सर झुकाना न जिन्हें रास कभी आता है,
ऐसे लोगों के आगे सितम झर जाएँगे।
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