Monday, 28 December 2015

Panchayati election days...!!!

सजग रहिये दोस्तो, पँचायती चुनावों के दिन हैं ,
झूठे भाषणों, मुस्कुराहटों व दिखावों के दिन हैं !

सारी उम्र अकड़ में काटी हैं अब सलाम कर रहे,
फिर सिर पर आ चढ़ेंगे, चँद झुकावों के दिन हैं !

खुदी में मस्त रहिये, सुनकर भी कुछ न कहिये,
उनके उलझनों या मानसिक तनावों के दिन हैं !

काम जिसने है किया बस उसको दीजिए दुआ,
संतुलन बनाये रखिये मन का दबावों के दिन हैं !

हाजमा और सेहत इकदम चुस्त दुरुस्त रखिये ,
मुर्ग- मुसल्लमों, दावतों और शराबों के दिन हैं!!
------------------ मनोज मैहता ---------------------

Monday, 21 December 2015

The hopes of heart are shattered..!!

नामुराद दिल के सारे अरमान टूटे हैं ,
कुछ दिनों से इसके मेहरबान रूठे हैं !

यूँ तो दिखाने को बनते हैं पाक साफ ,
असल में उन्होंनें कई कद्रदान लूटे हैं !

आँखें खुश्क हो गईं, खामोश है ज़ुबाँ ,
जब से इश्क़ के साज़ो सामान छूटे हैं !

अँधेरा और गहरा गया मेरे आसपास ,
जिस दिन से घर के रोशनदान फूटे हैं !

कहना तो चाहा मगर कह न पाया मैं ,
कि उनके सभी मुरीद,चाहवान झूठे हैं !!
---------------- मनोज मैहता ---------------

Saturday, 19 December 2015

Panchayati Raj....!!

दरअसल दोनों को इन दिनों, वोटों की दरकार है ,
कल तक जो जानी दुश्मन थे आज पक्के यार हैं !

प्रधानी इक है लड़ रहा तो दूजा समिति भिड़ रहा ,
मनरेगा का पैसा हड़पनें को पर दोनों ही तैयार हैं !

जातीय समीकरण भी, हैं बिलकुल उनके हक में ,
अपनें अपनें वर्ग के तो दोनों ही स्वयंभू सरदार हैं !

पँचों व उपप्रधानों की तो मानों बाढ़ ही है आई हुई ,
हर इक को भरोसा दे रहे कि हम तो तेरे ही यार हैं !

जिला परिषद की सीट महिला को है आरक्षित हुई ,
इस बात से दोनों के सिर से, घट गया तमाम भार है !

किराये की टैक्सियों में, बहुतेरा सफर है कर लिया ,
खरीद पर्सनल गाड़ी हमनें, लेनी जी अबकी बार है !!
------------------------ मनोज मैहता ---------------------

Thursday, 3 December 2015

Now I enjoy nothing ....!!

शेर और गज़लें लिखनें में पहले सा मज़ा नहीं रहा ,
तेरी सूरत पे मर मिटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !

कौड़ियों के भाव से कभी , बोली अपनी लगती थी ,
करोड़ों में अब बिकनें में, पहले सा मज़ा नहीं रहा !

झलक सनम की पानें को , जहाँ बैठा करते थे घँटों ,
दो घड़ी भी वहाँ टिकनें में , पहले सा मज़ा नहीं रहा!

छू लेने भर से ही तुमको, रोम रोम खिल उठता था ,
अब सीने से भी चिपटने में, पहले सा मज़ा नहीं रहा!

तेरे बहुत समझाने पर मैं थोड़ा सँकुचाया करता था ,
खुद चादर में सिमटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !!
----------------------- मनोज मैहता -----------------------

Monday, 30 November 2015

Heart beats enthusiastically....

सीनें में जवाँ सा जोश भी है तबियत में और उल्लास भी है,
चँद भूली बिसरी घड़ियों की कड़ियाँ जुड़नें की आस भी है.

तेरा मुझको देखके यूँ खिलना,फिर झट गले से आ मिलना,
मेरी सजनी ऐसा लगता है ज्यों जारी अपना मधुमास ही है.

कुदरत ने खेल रचाया था, क्यों दिल से दिल उकताया था,
भूल गई हो तुम वो काला युग, ऐसा मुझको विश्वास भी है.

तुमने सँभाला ही नहीं मुझको बल्कि सँवारा भी है मुझको,
कुछ भी नहीं हूँ मैं भुला पाया, ख़ताओं का अहसास भी है.

यकीनन मेरे इन अल्फाज़ों, से बेकाबू हुई तेरी साँस भी है,
जिन मस्त मौज़ों पे तैरे हैं, हर बार ही उनकी तलाश भी है..
-------------------------मनोज मैहता--------------------------

Friday, 27 November 2015

How could I get his secrets revealed!!


उह़ियाँ ता मड़ा बड़ा घ़ान्दा पर साईया छड्डी कुथ्यो जाह़ँगा,
स्वासी गियो इतणीं बद्धी , पीपणिंयाँ सैह़ किह़ियाँ बजाँगा?

तिन्ह़ां दे चक्करे दा रौल़ा, चोंह़नीं पासयाँ बड़ा ह़ी पई ग्या,
उह़ियां  मेरा ढिड ह़ै कच्चा, दस्सा गल्ला किंह़ियाँ पचांगा?

छन्दयाँ मिन्नताँ करी करी नें, जीआ करदा मैं मरी मरी ने ,
अन्दरें अन्दरें सोच्ची जा दा, कोह़की मिंज्जो भी पत्यांगा !

जाह़नुआँ दे गैय ह़ड्ड छलोई अपण तिन्ह़ाँ दी बस नीं ह़ोई ,
माऊ दी सगँद ख़ाद्दी मितरो, ह़टी तिसा बत्ता नी जाह़ँगा !

गप्पा नें गप्प निकल़ी जाँद्दी, फूक्की जीभ फिसल़ी जाँद्दी,
माफ करी छड्ड इब्हैं मितरा, कदी नीं ह़ुण पल़चाई पाह़ँगा !

रती कि जे टेर सैह़ लाई दिन्दा, मुँह़ें मेरे फट्ट खुड़ाई दिन्दा,
मेरे भ़ेद सैह़ जाणदा सारे, मैं तिस्दयाँ किंह़ियाँ क़ढवाँगा ?
----------------------- मनोज मैहता ---------------------

Tuesday, 24 November 2015

Consider it confession Bindia

लो ज़िंदगी की एक और जिम्मेदारी निपट गई,
गुजश्ता दौर की चँद यादें जिगर से लिपट गईं ।

बढ़ गई थीं दूरियाँ यकीनन जो हमारे दरम्यान,
बालू के पहाड़ सी वो इक ही पल में मिट गईं ।

ख़ूब भटके हम बेख़ौफ,बेधड़क बियावानों में ,
हस्ती मगर हर बार तेरे, इर्दगिर्द ही सिमट गई ।

यूँ नहीं कि खुशी देने की तुझे मेरी मँशा न थी ,
बदहाली- तँगदिली जरा, थी मुझसे चिपट गई ।

तू जो खुश है तो मैं भी बेफिक्र हुआ फिरता हूँ ,
छोड़ चिंता को कि कोई और है मेरे निकट हुई ।
------------------  मनोज मैहता -------------------

Saturday, 21 November 2015

He kept burning his heart...

मनें दे फफोल़याँ बठयाल़दा ही रह़ी गया ,
मोटर गई चली, मैं निहाल़दा ही रह़ी गया .

ह़ुस्नें दे बजारे बिच, झ़पट्टयां मारी गै सारे ,
मैं नौल़ाँ सांह़ी यारो , ताल़दा ह़ी रह़ी गया.

चोरिया दी बँड्डी नें तिन्ह़ां खीस्से लैये भ़री,
रात थी न्ह़ेरी मैं लम्फे बाल़दा ह़ी रह़ी गया.

नौंयाँ सूटाँ बूटाँ नें मितरां टौह़र थी कड्ढियो,
मैं पराणें फालड़ुयाँ ,खँगाल़दा ह़ी रह़ी गया.

मीटाँ दारुआँ छक्की, मस्तदे रैह़ सब भ़ाऊ,
सैह़ दुक्कु तिक्कुआं संभ़ाल़दा ह़ी रह़ी गया.

बड़े नखरयाँ दस्सी ह़ंड्डदी रह़ी ह़ोरसी नें सैह़
'मैहता' बचारा काल़जे जाल़दा ह़ी रह़ी गया ..
------------------मनोज मैहता ------------------

Saturday, 14 November 2015

Wasted my time in useless jobs

न अदाब ही कहा न ही सलाम किया ,
हर बात का मुझ पर ही इल्ज़ाम दिया ।

करते रहे जिसकी लम्बी उम्र की दुआ ,
उसनें ही तो हमारा जीना हराम किया ।

जिस नाकाम के चर्चे शहर में आम थे ,
उसी नें बस्ती में हासिल मुकाम किया ।

हमें ग़म है ताउम्र, काम न कोई किया ,
सारा वक्त हुज्ज़तों में ही तमाम किया ।

यारों की मेहरबानियाँ मुझपर हुईं बड़ी ,
हर बेज़ा हरकत को मेरे ही नाम किया ।।
-----------------मनोज मैहता ---------------

Monday, 9 November 2015

Be aware Mr. Modi...!!

बड़ा हो हल्ला करते थे जब हम कहते थे बड़बोला है,
बेगुसराय से भाजपा सांसद, अब यही वाणी बोला है  ।
शत्रुघ्न सिन्हा और भोला सिंह नें , खूब चढ़ाये पारे हैं ,
बोले बिहार चुनाव हम मोदी के बड़बोलेपन से हारे हैं ।
आर के सिंह जी ने भी केंद्र को सरेआम ललकारा है ,
किसी 'विजयवर्गीय' नें , शॉटगन को कुत्ता पुकारा है ।
खुश है हर राष्ट्रवादी, प्रसन्नचित आज हर बिहारी है ..,
पार्टी मूर्छावस्था में तो क्यों ब्रिटेन जाने की तैयारी है ?
शाँता जी ने भी सरेआम, नसीहत यही दे डाली है .,
सूखने लगा यह वट- वृक्ष, काँपी हर डाली डाली है !!
डी एन ए बिहारियों का आज सबके सिर चढ़ बोला है,
विश्वास फासीवादियों का अाज बुरी तरह से डोला है ।
लालू को शैतान कहा तो इसका फल खुद ही पाया है,
मोदी -शाह की जोड़ी को, धूल का अहसास कराया है ।
सबको नैप्थय पर धकेलने की योजना हुई धराशायी है,
मोदी जी जरा सँभल जाईए अब आपकी बारी आई है।

-------------------- मनोज मैहता -----------------------------

Sunday, 8 November 2015

He is crossing the limits of hatred

नफरतों की सब ही हदें लाँघता है ,
कोई मेरी मौत की दुआ माँगता है ।

उसकी सनक है या तुनकमिजाज़ी?
छोड़कर उँगली, गिरेबान थामता है ।

दिखावट को यूँ तो बनता है बेचारा ,
असल में है क्या, वो ख़ुद जानता है ।

जिसकी नज़र में , कभी मैं ख़ुदा था,
आज वोही मुझको शैतान मानता है ।

महलों में रहना जिसे बहुत पसंद था,
आजकल कूचों की ख़ाक छानता है ।।
-------------मनोज मैहता -----------------

Tuesday, 3 November 2015

Might is right

जाह़लु ते नाँ मेरा बिकणां  लग्गा ,
जोसी भ़ी टिपड़ुए दिखणां लग्गा ।

कबल्ले ख्याल थे खोपरें  बड़यो ,
भ़ुल्ले सब जाह़लु लिखणां लग्गा ।

सुभ कारजे जो जाँदयां दिख्खी ,
सरीक ठस्से नें छिक्कणां लग्गा ।

लुगड़े छक्की साह़ंन था  बणयां ,
ह़ुण कजो जँग्घ़ां जिकणां लग्गा?

सिगटे बिच था मिठड़ा  लग्गदा ,
धूँ  चिलमाँ  दा  तिखणां  लग्गा ।

छड्ड भँग्गा  देयां  सूट्टयाँ  मितरा ,
मींजूए च ह़ुण एह़ चिटणां लग्गा ।।

--------- मनोज मैहता -------------

Friday, 23 October 2015

This passion shall be over

उतर ही जाएगा हुज़ूर छाया जो सुरूर है,
यह बता दीजिए किस बात का गुरूर है ?

यूँ तो चाहवानों की, हमें कोई कमी नही ,
आपकी चाहत की मगर तलब जरूर है।

वहम चँद आपने, हैं जहन में पाले हुए ,
वक्त सँग हट जायेगा बेज़ा जो फ़ितूर है।

तौहीन मेरी करना माना तुम्हारा शौक है ,
आपकी गलती नहीं, दुनिया का दस्तूर है।

आपकी सूरत पर दिल जो मेरा आ गया,
ख़ुद ही बता दीजिए , मेरा क्या कसूर है ?
----------------- मनोज मैहता------------------

Thursday, 22 October 2015

Dussehra...?????

आज फिर दशहरे में रावण को जलते देखा ,
अपनें भीतर भी लेकिन उसको पलते देखा ।

राम बना जो शख्स मर्यादा की मूरत दिखा ,
पर्दे के पीछे ही उसे आँखें गरम करते देखा ।

हर चौराहे पर नज़र आए खरदूषण त्रिसरा ,
हरेक मोड़ पर माँ सीता को बिलखते देखा ।

घर घर में कैकेयी और मँथरा ने डेरा डाला ,
लखन को राम ही के विरोध में चलते देखा ।

भरत खड़ाऊँ की स्वर्ण कीलें हिलाता रहा ,
हनुमान को क्रोध की अग्नि में जलते देखा ।

बँद करिये अब बाँस-ओ बारूद को फूँकना ,
हर किसी को अपने अहम में जलते देखा  ।।

---------------- - मनोज मैहता ------------------

Tuesday, 20 October 2015

Old lady's grief

अज मिये बोबो तिन्नें पाई पल़चाई दित्ती ,
नणाना कन्नें लौकी भ़रौजी लड़ाई दित्ती ।

देया बाभ़ो सारा टब्बर रैह़ंदा था प्यारे ने ,
बड़कें अद्धे अँगणें च तार लोआई दित्ती ।

स्यापा भ़ी जल़या तदुँआ ते लग्गा पौंणां ,
जद्धौकी बिट्टिया दी करी कुड़माई दित्ती ।

त्रिये म्ह़ीनें चुल्ह़ीं लग्ग थिंयाँ करी लियाँ ,
तेरे भ़णोए दी मिये मसें मैं छमाह़ी कित्ती ।

बड़ी बुरी गत मिये, जीणां ह़ोया मुस्कल ,
ह़ुण ता मैं भ़ी जीणें दी चाह़ मुकाई दित्ती।।

---------------- मनोज मैहता -----------------

Friday, 16 October 2015

He kept reading sadness in her eyes

संशय के पहाड़ पर चढ़ता रहा कोई ,
आँखों में मायूसियाँ पढ़ता रहा कोई ।

उसे खुश रखने के लाखों यत्न किये ,
ग़मों के नये किस्से, घड़ता रहा कोई ।

मँजिल के करीब ही राह भटक गया ,
उल्टी दिशा में ताउम्र बढ़ता रहा कोई ।

हालात मेरे ज्यूँ ज्यूँ, यारो सुधरने लगे ,
द्वेष के ताप में यूँही, सड़ता रहा कोई ।

वो बात और धुन का तो पूरा था धनी ,
तभी तो मुकद्दरों से, लड़ता रहा कोई ।।

...............  मनोज  मैहता...............

Thursday, 8 October 2015

Don't spread rumours

जितणें कि रुपियै ह़ैन्न लयँदयों जुआरियाँ ,
तिन्ह़ां ते ता बद्ध मेयो कठेरयो भ़खारियाँ ।

म्ह़ारे क्ल़ेसे दा पेया, चौंह़्नी पास्से चरचा ,
इत्तणें मज्झ़में कद्द़ी, लाये नी मदारियाँ ।

जितणियाँ बझ़ाणें दिया, जुगताँ मैं करदा ,
तितणियाँ करदा सै़ह़ घ़ुल़ाणें दी त्यारियाँ ।

कजो फलाह़ई जा दे, यारो गप्पाँ झ़ूठियाँ ?
मैं ता लुकाइयाँ मेयो, सच्चिंयाँ तम्ह़ारियाँ ।

मेरी इक गप्प कनें, गठ्ठी बह़ंनी लैह़ंनयों ,
घ़ोड़े ते ला़ेई मत करदे, गधे दी सवारियाँ ।।

--------------- मनोज मैहता ----------------

Wednesday, 7 October 2015

Your silences don't pinch me now.

चुभती नहीं अब मुझे, ये तेरी खामोशियाँ ,
और भी काम हैं कुछ और हैं सरगोशियाँ ।

माना इश्क़ का सुरूर रग-रग में छाया था ,
रूखेपन से पर तेरे, टूटी हैं ये मदहोशियाँ ।

बँधा रहा आँचल से,ताज़वानी शख्स जो ,
क्यूँ करे ढली उम्र में, वो जिस्मफ़रोशियाँ ।

चेहरा अपना आईने में, देख ले तू गौर से ,
नज़र तुम्हें भी आयेंगे चँद तो दागो निशाँ ।

किरदार तेरे ने ही, विवश कहने को किया ,
शायद अब न आयें, रिश्तों में गर्मजोशियाँ ।।
--------------- मनोज मैहता -----------------

Monday, 5 October 2015

Sweet winter creeps slowly

सीरदे स्याल़े दी मिट्ठी, ठँड तनें लग्गा दी ,
गायी दी सगन्द मेयो, अग्ग मनें लग्गा दी ।

छड्डी नें गद्धेरनें गद्दी, जोत्तीं लोह़्णां लग्गे,
खीरयाँ ता दुँडुआँ नें शान ध़णें लग्गा दी ।

सूई जे पइयां किछ ध़ारा ध़ारा लोह़ंदियां,
अपणीं ह़ी ह़ाख जल़ी, बुरी थणें लग्गा दी।

पट्टु,कम्बल़,लेह़्फ, बछाणें लग्गे सजणां,
क्याड़िया दी मैल जाई नें सरैह़्णें लग्गा दी।

चणें ता रयोड़ियाँ ह़ुण ख़ुड़ी गईयाँ बोरियाँ,
खरोड़याँ खाणें जो रूह़ बड़ी कनें लग्गा दी ।
-------------------मनोज मैहता ----------------

Thursday, 1 October 2015

To be notorious is also necessary...

घूमिये चाहे जितना मर्ज़ी पर काम भी होना जरूरी है ,
ख़ुदा कसम आादमी का कुछ नाम भी होना ज़रूरी है ।

तरोताज़ा कर तो देती है, इंसान को हर इक नई सुबह,
बोझिल सी इस ज़िंदगी में पर शाम भी होना ज़रूरी है ।

दुनिया के इस बाज़ार में , बिक जानें को मैं भी हूँ तैयार ,
लेकिन मेरी हस्ती का वाज़िब, दाम भी होना ज़रूरी है ।

जा रहा है वोह दिलों का कातिल यूँ लोग सारे कह उठे ,
तब मुझे यह ग़ुमाँ हुआ कि बदनाम भी होना ज़रूरी है ।

ज़हर से भी कड़वे घूँट तो मुझे, सूफीयत नें पिला दिये ,
फिर से लगने लगा कि हाथ मे ज़ाम भी होना ज़रूरी है ।
------------------------मनोज मैहता --------------------------

Tuesday, 29 September 2015

I know you air... Conspirator!!!

संदेह या अविश्वास की चोट दे गया ,
कोई मेरी शराफ़त पर खोट दे गया ।

उससे कैसा ग़िला और कैसी खुन्नसें,
नामुराद झूठी यारी की ओट ले गया ।

यूँ बाहर से तो लगता हूँ ठीकठाक मैं ,
पर तेरा वार भीतर तक कचोट गया ।

एै हवा रुख मेरा जो तुफानी हो गया,
तो कहोगी तेरी हस्ती को समेट गया ।

पीठ पीछे खँजर अब चुभता नहीं मुझे,
सख्त ढाल कब से मैं पीछे लपेट गया ।
----------------मनोज मैहता ---------------

Sunday, 27 September 2015

Kangra and it's variations

काँगड़े पईयो गर्मी, मकलोड़गँज बरखा पोआ दी
औथु छुटन पसीनें मितरो कनें इथु ठँड बझ़ोआ दी

नगरोटा प्या उबल़ी उबल़ी, पालमपुर ह़ै ठँडा ठार   ,
उतराल़े दी मस्त ह़ोआ चोबीनाँ पुज्जी गरमोआ दी ।

कोसरी ता लम्मे ग्राँएँ तौंदिया माह़णूँ किंह़ियाँ जाएँ ,
कनें चँदपुर जाई नें दिख्खा, कोटी लाणाँ पोआ दी ।

भँगाल़ बड्डा-छोट्टा , बिलिंग, मुलथान ता लुहारड़ी ,
मिट्ठी-मिट्ठी ठँड्डी ठार ह़ोवा पूरे पिन्ड्डे च भ़रोआ दी।

मन्याँ कि शाह़पुर गरम ह़ै जा भ़ला बोह़ दरीणियाँ  ,
गाय़ी दी सौह़ रूह़ खुसिया ने नच्ची नच्ची पोआ दी ।

डमटाल़, नूरपुर, जसूर, जवाल़ी धमेटा या फतेह़पुर,
साह़की तुह़ाकी मैंनु तैनुँ , बोल्ली भ़ी बदलोआ दी ।

देहरा, गरली परागपुर ज्वालामुखी मझींण जसवाँ ,
सारे लाके लेयाँ हँड्डी, अपणीं ही जिमीं बझ़ोआ दी।

म्ह़ारी ताकत खुब्बदी बड़ी ताँह़ी स्कीमां घ़डी घ़डी, 
काँगड़े जो तोड़ने दी बड़ी साजश गह़री ह़ोआ दी !!

----------------------मनोज मैहता ---------------------

Wednesday, 23 September 2015

I beg your Love....

चाहे आँखें तरेरिये या जोर से चीख लीजिए
इल्तज़ा है अपने प्यार की पर भीख दीजिए

जज़्वा-ए-इश्क़ आपनें जो मुझमें जगा दिया
पीछे नही अब हटूँगा मैं, यह सीख लीजिए

डसनें लगी तन्हाईयाँ जी छोड़िए रुसवाईयाँ
हर सूरत में तय मिलन की, तारीख़ कीजिए

फिरता हूँ मैं मारा मारा आपका ही है सहारा
आगोश में जरा कसकर, मुझे भींच लीजिए

आपकी हर अदा पर मर- मर के मैं जिया हूँ
झूठी ही सही इक मर्तबा तो तारीफ़ कीजिये

राज़ मैनें यार अपना, कोई तुमसे न छिपाया
छिपाकर मुझसे बातें, न यूँ तकलीफ दीजिए

खुशियों पर पूरा हक आपका ही है यकीनन
अपनें ग़म में तो मुझको भी शरीक कीजिये

नींद मेरी ख़ो गई है , करार भी तो हैं ग़ायब
क्या आप हैं मज़े में ? यह तस्दीक कीजिए ।।
------------------मनोज मैहता----------------

Tuesday, 22 September 2015

In her love

जितना हम उनके इश्क़ में डूबते गए
वो उतना ही ज़्यादा हमसे ऊबते गए

मुझे नफरत हो गई गेसुओं से यार के
रह रह के उन गालों को जो चूमते रहे

मानकर उसके घर को मक्का- शरीफ
उस गली में बनके हाज़ी हम घूमते रहे

तेरा प्यार और तू,दोनों हममेें ही तो थे
एै ख़ुदा और तुझे हम, कहाँ ढूँढते रहे

तेरे प्यार का नशा सिर पर ऐसा चढ़ा
बगैर पिये ही उम्र भर, हम झूमते रहे
------------मनोज मैहता --------------

Sunday, 20 September 2015

No complaints...

किस बात के उलाहनें, कैसी शिकायतें ?
बदलनी नहीं जब तुमनें अपनी आदतें ।

हम मस्त हो गए कशमकश में अपनीं ,
भूले फिर करना मस्तियाँ और शरारतें ।

कुछ वक्त खुशी का तेरे सँग जो गुजरा,
देता रहेगा ताउम्र, अब हमें यह राहतें ।

जो कुछ हुआ सिर्फ इक खेल ही लगा,
ऐसी वैसे हो सकती नहीं सच्ची चाहतें ।

अाँख- कान मेरे अब काम के कहाँ रहे ?
न दिखे तेरी सूरत, न सुनाई देतीं आहटें ।

बड़ा खुश हैं मैं कि पेट भर केे मिल गया ,
नसीब में मेरे अब कहाँ वो शाही दावतें ।
---------------मनोज मैहता ----------------

Who is responsible for this debacle?

कौन आख़िर इस दुर्दशा का असली जिम्मेदार है
नेताजी के साथ बेटे को भी लो पड़ने लगे हार हैं

अब प्रधान बनकर है अकड़ता फिर रहा शान से
पार्टी से ज्यादा जिसको अपने ओहदे से प्यार है

उसी को है अहमियत, मिलती उसे ही पदवियाँ
दल बदलनें के लिए, जो किसी भी पल तैयार है

वर्कर का तो फर्ज़ ही है, कसीदे पढ़ना शान में
मुखालफ़त जरा सी करे, कह दीजिए गद्दार है

कहाता यूँ तो बुनियाद या सतह की जढ़ भी है
पीठ पीछे मगर कहेंगे कि बेज़ा सिर पर भार है

विजयी रहे तो सारा श्रेय, काम अपनें को दिया
ठीकरा वर्कर के सिर पर,अगर मिली जो हार है

अफसरों से घिरकर कहाँ असल दिखेगा हुज़ूर
सच्च पता चल जायेगा, जब टूटनी सरकार है

बुरे वक्त में हम ही होंगे, आपके सर आसपास
अभी ख़ास जरूरत नहीं, चमचों की भरमार है
-------------------मनोज मैहता---------------------

Tuesday, 15 September 2015

Reality of Congress in HP

काँग्रेस सँगठन के अँदर देखो बँदर बाँट लगी है
और काम तो कुछ नहीं होता काट-छाँट लगी है

उसे हटाओ उसे बनाओ, आपस में उन्हें लडाओ
दाँवपेंच में लगा रहा वो, यूँ ख़ुद की वाट लगी है

झूठ मूठ की रिपोर्टें हाई कमान तक पहुँचा दी हैं
असली रपट पर दराज़ में दीमक की चाट लगी है

यहाँ मज़े लगे चापलूसों के, एैश है चाटुकारों की
वफ़ादार सिपाहियों की और उलटी खाट लगी है

जीते हुए सरकार में हैं, सब हारे हुए दरबार में हैं
वर्करों क्यों चिंतित हो? तुम्हारे लिए टाट लगी है

राहुल गाँधी की नहीं हुज़ूर इन्हें खुद की है चिंता
यहाँ अगर न बन पाई तो उधर भी बात लगी है

बैठे हैं इस कुर्सी पर पर मन डोलता ही रहता है
यहाँ तो बस यूँही पड़े हैं, कहीं और घात लगी है
------------------ मनोज मैहता ---------------------

Sunday, 13 September 2015

I walk chained in your promises

ज़हन में तेरे वादों की जँजीर लिए फिरता हूँ ,
सीनें में पर तेरी हसीँ, तस्वीर लिए फिरता हूँ ।

तेरे लफ्ज़ नश्तर से चुभे हैं गहराई तक मुझे ,
मगर बेहया बेशर्म सा, ज़मीर लिए फिरता हूँ ।

अहमो हस्ती का है, मिटना इश्क़ में लाज़िमी ,
तभी तेरे फ़रमान की, तामील किये फिरता हूँ ।

आकर तेरी ज़िंदगी को भी दोज़ख बना दिया ,
माथे पर इतनीं काली, लकीर लिए फिरता हूँ ।

तूनें मेरे किरदार को, पहचाना पूरा ही दरुस्त ,
धोखे में थे लोग कि, तकदीर लिए फिरता हूँ ।

घायल हूँ दिलो- रूह से, पर फिर भी शाद हूँ ,
क्योंकि तेरी यादों की, जागीर लिए फिरता हूँ।।
-------------------मनोज मैहता-------------------

Friday, 11 September 2015

You are writing against justice

इंसाफ के खिलाफ ही तंत्र के हक में लिखनें लगा ,
बात पक्का तय है कि वो शख्स अब बिकनें लगा ।

वज़ूद तेरा यार मेरे, तेरी कलम और स्याही में था ,
कलम गिरवी हो गई तो यह खुद ही मिटनें लगा  ।

शायरों और लेखकों का तो शौक था फ़ाकाकशी ,
पेट लबालब भर गया तब जज़्वा वो मिटनें लगा ।

चेहरों पर नकाबें पहन लीं या मुखौटे चढ़ा लिये ,
बासी अखबार में पर असल चेहरा दिखनें लगा ।

जम्हूरियत की आबरु, चँद हुक्मरानों नें लूट ली ,
और चौथा स्तँभ भी इसी छत्त तले टिकनें लगा ।
------------------- मनोज मैहता ----------------------

I forewarn you...!!

जलज़लों में अचल पत्थर हिल भी जाते हैं ,
टकरा कर मौज़ों से रेत में मिल भी जाते हैं ।

मर्द जात का भरोसा कम ही कीजिये हुज़ूर,
जरा सी आँच पर मोम से पिघल भी जाते हैं ।

उसको रहनें दो मदमस्त, तुम उसके ग़रूर में,
मरते वक्त चींटिंयों के पर निकल ही आते हैं ।

मेरी बकवास पर न यूँही रूठ जाया कीजिये,
क्या करूँ लफ़्ज़ जुबाँ से फिसल भी जाते हैं ।

हम सनकी हैं थोड़े, है ढँग से यह मालूम तुझे
वक्त आनें पे विरह का विष निगल भी जाते हैं

हमें छोडके़ थामा दूजे काे, ग़म हमें न है कोई
कुछ देर साथ देनें को, साथी मिल भी जाते हैं
------------------- मनोज मैहता --------------------

Thursday, 10 September 2015

Your betrayal

दिल की बात आपको क्यों सुनाई न दे?
छलका प्यार नज़रों में भी दिखाई न दे ।

मेरी वफ़ा तेरी ज़फ़ा का अजब मेल है ,
इस करिश्में की तो ख़ुदा भी दुहाई न दे ।

इश्क- मुहब्बत का यारो गज़ब खेल है ,
इसमें अच्छा या बुरा कुछ दिखाई न दे ।

छोड़ कर महफ़िलें अकेले बैठे हैं हम ,
बड़ी लम्बी भी या रब्ब तू जुदाई न दे।

उनकी हरकत से ख़ासा हूँ परेशान मैं ,
यह काम उन्हें कहीं मेरी रुसवाई न दे ।

सोच सोच कर पागल ही हो जाऊँ मैं,
एै रब्ब इतनी भी तू मुझे तन्हाई न दे ।।

-------------मनोज मैहता ------------------

Wednesday, 9 September 2015

Please speak something


                    ... बोलिए. ......
किबाड़ अपनें दिल के यार धीरे धीरे खोलिये
हाँ नहीं तो न ही सही मगर कुछ तो बोलिए

आपके ही इश्क़ में तो, फिरता हूँ मैं बेकरार
फेरकर अपनी निगाहें न हस्ती को झिंझोड़िए

देखा मुस्कुराकर उसे जैसे दिलनशीं हो बड़ा
हम भी तो ठीक ठीक हैं, कम न ऐसे तोलिये

राज़-ए-दिल हरेक मैंनें, आपसे साझा किया
अब यूँ खामोश रहकर, मन को न टटोलिये

कातिल निगाहें आपकी कर रहीं हैं मारकाट
हमें काट ही डालिये ,मुर्दा हैं कब के हो लिये

सित्तम भी तो आपके, नई अदा ही लगते हैं
और ज़ुल्म ढा दीजिए, इक बार हँस के बोलिए

Wednesday, 2 September 2015

Don't think a lot...

सोच्ची सोच्ची किछ नीं बणनाँ कम्म जे तैं किछ नीं करना
मनें मसोसी किह़िंयाँ जीणाँ, बाझ़ी मौत्ती किह़िंयाँ मरना?

उप्परे आल़े दिया मर्जिया गाँह़ ता तेरी मेरी पेश नीं चलणीं
फिरी कैह़दी चिंता ह़ै तिज्जो, जे़ड़ा बणना ठीक ह़ी बणना

लोक्काँ दी गप्पाँ नीं लगणाँ, खोप्पर ता तिज्जो भी दित्तया
गरीबाँ दी भी सुणाँ कर मोआ,अपणाँ ह़ी बस घ़र नीं भ़रना

प्रीत जे कुथकी लग्गी जाए, दिलडुएँ कोह़की बस्सी जाए
अन्दर अन्दर कितणां कुढनां, जमानें ते कितणा की डरना

कद्दी कद्दी मन उखड़ी जादाँ, रैह़ भौंएं कोह़की पतियाँदा
अपण मता किछ सोचणां पौंद्दा, इह़ियाँ भी बाबे नीं बणनाँ

ऐस्सियाँ गप्पाँ गलाई बैह़ँदा, काल़जुए बिच ह़ी आई रैह़ँदा
उह़ियाँ भी सरीफ ह़ै मैहता, इकदम मनें ते किह़िंयाँ कढणां

----------------------- मनोज मैहता ------------------------

Tuesday, 1 September 2015

I am happy to be ruined

इश्क भी शै है यारो बिलकुल अजीब सी ,
तौहीन इसमें होती है, अक्सर गरीब की ।

समझायें क्या उन्हें, है पक्का यकीं जिन्हें,
कि जिंदगी हमारी, ख़ुद है बेतरतीब सी ।।

फ़ासले बढ़ते गए जितना हम चलते रहे ,
दूर हुई मँज़िल लगती थी जो करीब सी ।।।

बेकार की दलाली में हाथ ऐसे रँग लिए ,
धूमिल ही हो गई, लकीर मेरे नसीब की।।

ख़ाक होकर भी मैं शाद हुआ फिरता हूँ ,
यह होना तय था रज़ा थी यही रकीब की ।।
------------------मनोज मैहता ----------------------

Saturday, 29 August 2015

Is it real democracy??

वर्कर तो भयग्रस्त हैं, नेता लोग मस्त हैं
अफसरों की मौज है और जनता त्रस्त है

चाहे हो काँग्रेस, हो चाहे फिर  भाजपा
सरकार हिमाचल की मिलाजुला ट्रस्ट है

असली नकली की परख नहीं हुज़ूर को
बढ़ता ही जा रहा दोनों तरफ अनरैस्ट है

अपनें विधायक का पूरा विरोध कीजिए
डरनें की चिंता नहीं, साब का इन्ट्रेस्ट है

एक आध मन्त्री जो काम ठीक कर रहा
उसके बढ़ते भाव से, सी एम को कष्ट है

जम्हूरियत के मायनें लगता है बदल गए
जमानत न बचा सका, वो निगम अध्यक्ष है

जोड़ जुगाड़ करनें में पूरा जो दक्ष हो गया
प्राँत का प्रधान मित्रो,आज वो ही शख्स है 

  .................मनोज मैहता....................

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...