ज़हन में तेरे वादों की जँजीर लिए फिरता हूँ ,
सीनें में पर तेरी हसीँ, तस्वीर लिए फिरता हूँ ।
तेरे लफ्ज़ नश्तर से चुभे हैं गहराई तक मुझे ,
मगर बेहया बेशर्म सा, ज़मीर लिए फिरता हूँ ।
अहमो हस्ती का है, मिटना इश्क़ में लाज़िमी ,
तभी तेरे फ़रमान की, तामील किये फिरता हूँ ।
आकर तेरी ज़िंदगी को भी दोज़ख बना दिया ,
माथे पर इतनीं काली, लकीर लिए फिरता हूँ ।
तूनें मेरे किरदार को, पहचाना पूरा ही दरुस्त ,
धोखे में थे लोग कि, तकदीर लिए फिरता हूँ ।
घायल हूँ दिलो- रूह से, पर फिर भी शाद हूँ ,
क्योंकि तेरी यादों की, जागीर लिए फिरता हूँ।।
-------------------मनोज मैहता-------------------
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