इंसाफ के खिलाफ ही तंत्र के हक में लिखनें लगा ,
बात पक्का तय है कि वो शख्स अब बिकनें लगा ।
वज़ूद तेरा यार मेरे, तेरी कलम और स्याही में था ,
कलम गिरवी हो गई तो यह खुद ही मिटनें लगा ।
शायरों और लेखकों का तो शौक था फ़ाकाकशी ,
पेट लबालब भर गया तब जज़्वा वो मिटनें लगा ।
चेहरों पर नकाबें पहन लीं या मुखौटे चढ़ा लिये ,
बासी अखबार में पर असल चेहरा दिखनें लगा ।
जम्हूरियत की आबरु, चँद हुक्मरानों नें लूट ली ,
और चौथा स्तँभ भी इसी छत्त तले टिकनें लगा ।
------------------- मनोज मैहता ----------------------
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