Friday, 11 September 2015

You are writing against justice

इंसाफ के खिलाफ ही तंत्र के हक में लिखनें लगा ,
बात पक्का तय है कि वो शख्स अब बिकनें लगा ।

वज़ूद तेरा यार मेरे, तेरी कलम और स्याही में था ,
कलम गिरवी हो गई तो यह खुद ही मिटनें लगा  ।

शायरों और लेखकों का तो शौक था फ़ाकाकशी ,
पेट लबालब भर गया तब जज़्वा वो मिटनें लगा ।

चेहरों पर नकाबें पहन लीं या मुखौटे चढ़ा लिये ,
बासी अखबार में पर असल चेहरा दिखनें लगा ।

जम्हूरियत की आबरु, चँद हुक्मरानों नें लूट ली ,
और चौथा स्तँभ भी इसी छत्त तले टिकनें लगा ।
------------------- मनोज मैहता ----------------------

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...