इश्क भी शै है यारो बिलकुल अजीब सी ,
तौहीन इसमें होती है, अक्सर गरीब की ।
समझायें क्या उन्हें, है पक्का यकीं जिन्हें,
कि जिंदगी हमारी, ख़ुद है बेतरतीब सी ।।
फ़ासले बढ़ते गए जितना हम चलते रहे ,
दूर हुई मँज़िल लगती थी जो करीब सी ।।।
बेकार की दलाली में हाथ ऐसे रँग लिए ,
धूमिल ही हो गई, लकीर मेरे नसीब की।।
ख़ाक होकर भी मैं शाद हुआ फिरता हूँ ,
यह होना तय था रज़ा थी यही रकीब की ।।
------------------मनोज मैहता ----------------------
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