जितना हम उनके इश्क़ में डूबते गए
वो उतना ही ज़्यादा हमसे ऊबते गए
मुझे नफरत हो गई गेसुओं से यार के
रह रह के उन गालों को जो चूमते रहे
मानकर उसके घर को मक्का- शरीफ
उस गली में बनके हाज़ी हम घूमते रहे
तेरा प्यार और तू,दोनों हममेें ही तो थे
एै ख़ुदा और तुझे हम, कहाँ ढूँढते रहे
तेरे प्यार का नशा सिर पर ऐसा चढ़ा
बगैर पिये ही उम्र भर, हम झूमते रहे
------------मनोज मैहता --------------
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