Tuesday, 29 September 2015

I know you air... Conspirator!!!

संदेह या अविश्वास की चोट दे गया ,
कोई मेरी शराफ़त पर खोट दे गया ।

उससे कैसा ग़िला और कैसी खुन्नसें,
नामुराद झूठी यारी की ओट ले गया ।

यूँ बाहर से तो लगता हूँ ठीकठाक मैं ,
पर तेरा वार भीतर तक कचोट गया ।

एै हवा रुख मेरा जो तुफानी हो गया,
तो कहोगी तेरी हस्ती को समेट गया ।

पीठ पीछे खँजर अब चुभता नहीं मुझे,
सख्त ढाल कब से मैं पीछे लपेट गया ।
----------------मनोज मैहता ---------------

Sunday, 27 September 2015

Kangra and it's variations

काँगड़े पईयो गर्मी, मकलोड़गँज बरखा पोआ दी
औथु छुटन पसीनें मितरो कनें इथु ठँड बझ़ोआ दी

नगरोटा प्या उबल़ी उबल़ी, पालमपुर ह़ै ठँडा ठार   ,
उतराल़े दी मस्त ह़ोआ चोबीनाँ पुज्जी गरमोआ दी ।

कोसरी ता लम्मे ग्राँएँ तौंदिया माह़णूँ किंह़ियाँ जाएँ ,
कनें चँदपुर जाई नें दिख्खा, कोटी लाणाँ पोआ दी ।

भँगाल़ बड्डा-छोट्टा , बिलिंग, मुलथान ता लुहारड़ी ,
मिट्ठी-मिट्ठी ठँड्डी ठार ह़ोवा पूरे पिन्ड्डे च भ़रोआ दी।

मन्याँ कि शाह़पुर गरम ह़ै जा भ़ला बोह़ दरीणियाँ  ,
गाय़ी दी सौह़ रूह़ खुसिया ने नच्ची नच्ची पोआ दी ।

डमटाल़, नूरपुर, जसूर, जवाल़ी धमेटा या फतेह़पुर,
साह़की तुह़ाकी मैंनु तैनुँ , बोल्ली भ़ी बदलोआ दी ।

देहरा, गरली परागपुर ज्वालामुखी मझींण जसवाँ ,
सारे लाके लेयाँ हँड्डी, अपणीं ही जिमीं बझ़ोआ दी।

म्ह़ारी ताकत खुब्बदी बड़ी ताँह़ी स्कीमां घ़डी घ़डी, 
काँगड़े जो तोड़ने दी बड़ी साजश गह़री ह़ोआ दी !!

----------------------मनोज मैहता ---------------------

Wednesday, 23 September 2015

I beg your Love....

चाहे आँखें तरेरिये या जोर से चीख लीजिए
इल्तज़ा है अपने प्यार की पर भीख दीजिए

जज़्वा-ए-इश्क़ आपनें जो मुझमें जगा दिया
पीछे नही अब हटूँगा मैं, यह सीख लीजिए

डसनें लगी तन्हाईयाँ जी छोड़िए रुसवाईयाँ
हर सूरत में तय मिलन की, तारीख़ कीजिए

फिरता हूँ मैं मारा मारा आपका ही है सहारा
आगोश में जरा कसकर, मुझे भींच लीजिए

आपकी हर अदा पर मर- मर के मैं जिया हूँ
झूठी ही सही इक मर्तबा तो तारीफ़ कीजिये

राज़ मैनें यार अपना, कोई तुमसे न छिपाया
छिपाकर मुझसे बातें, न यूँ तकलीफ दीजिए

खुशियों पर पूरा हक आपका ही है यकीनन
अपनें ग़म में तो मुझको भी शरीक कीजिये

नींद मेरी ख़ो गई है , करार भी तो हैं ग़ायब
क्या आप हैं मज़े में ? यह तस्दीक कीजिए ।।
------------------मनोज मैहता----------------

Tuesday, 22 September 2015

In her love

जितना हम उनके इश्क़ में डूबते गए
वो उतना ही ज़्यादा हमसे ऊबते गए

मुझे नफरत हो गई गेसुओं से यार के
रह रह के उन गालों को जो चूमते रहे

मानकर उसके घर को मक्का- शरीफ
उस गली में बनके हाज़ी हम घूमते रहे

तेरा प्यार और तू,दोनों हममेें ही तो थे
एै ख़ुदा और तुझे हम, कहाँ ढूँढते रहे

तेरे प्यार का नशा सिर पर ऐसा चढ़ा
बगैर पिये ही उम्र भर, हम झूमते रहे
------------मनोज मैहता --------------

Sunday, 20 September 2015

No complaints...

किस बात के उलाहनें, कैसी शिकायतें ?
बदलनी नहीं जब तुमनें अपनी आदतें ।

हम मस्त हो गए कशमकश में अपनीं ,
भूले फिर करना मस्तियाँ और शरारतें ।

कुछ वक्त खुशी का तेरे सँग जो गुजरा,
देता रहेगा ताउम्र, अब हमें यह राहतें ।

जो कुछ हुआ सिर्फ इक खेल ही लगा,
ऐसी वैसे हो सकती नहीं सच्ची चाहतें ।

अाँख- कान मेरे अब काम के कहाँ रहे ?
न दिखे तेरी सूरत, न सुनाई देतीं आहटें ।

बड़ा खुश हैं मैं कि पेट भर केे मिल गया ,
नसीब में मेरे अब कहाँ वो शाही दावतें ।
---------------मनोज मैहता ----------------

Who is responsible for this debacle?

कौन आख़िर इस दुर्दशा का असली जिम्मेदार है
नेताजी के साथ बेटे को भी लो पड़ने लगे हार हैं

अब प्रधान बनकर है अकड़ता फिर रहा शान से
पार्टी से ज्यादा जिसको अपने ओहदे से प्यार है

उसी को है अहमियत, मिलती उसे ही पदवियाँ
दल बदलनें के लिए, जो किसी भी पल तैयार है

वर्कर का तो फर्ज़ ही है, कसीदे पढ़ना शान में
मुखालफ़त जरा सी करे, कह दीजिए गद्दार है

कहाता यूँ तो बुनियाद या सतह की जढ़ भी है
पीठ पीछे मगर कहेंगे कि बेज़ा सिर पर भार है

विजयी रहे तो सारा श्रेय, काम अपनें को दिया
ठीकरा वर्कर के सिर पर,अगर मिली जो हार है

अफसरों से घिरकर कहाँ असल दिखेगा हुज़ूर
सच्च पता चल जायेगा, जब टूटनी सरकार है

बुरे वक्त में हम ही होंगे, आपके सर आसपास
अभी ख़ास जरूरत नहीं, चमचों की भरमार है
-------------------मनोज मैहता---------------------

Tuesday, 15 September 2015

Reality of Congress in HP

काँग्रेस सँगठन के अँदर देखो बँदर बाँट लगी है
और काम तो कुछ नहीं होता काट-छाँट लगी है

उसे हटाओ उसे बनाओ, आपस में उन्हें लडाओ
दाँवपेंच में लगा रहा वो, यूँ ख़ुद की वाट लगी है

झूठ मूठ की रिपोर्टें हाई कमान तक पहुँचा दी हैं
असली रपट पर दराज़ में दीमक की चाट लगी है

यहाँ मज़े लगे चापलूसों के, एैश है चाटुकारों की
वफ़ादार सिपाहियों की और उलटी खाट लगी है

जीते हुए सरकार में हैं, सब हारे हुए दरबार में हैं
वर्करों क्यों चिंतित हो? तुम्हारे लिए टाट लगी है

राहुल गाँधी की नहीं हुज़ूर इन्हें खुद की है चिंता
यहाँ अगर न बन पाई तो उधर भी बात लगी है

बैठे हैं इस कुर्सी पर पर मन डोलता ही रहता है
यहाँ तो बस यूँही पड़े हैं, कहीं और घात लगी है
------------------ मनोज मैहता ---------------------

Sunday, 13 September 2015

I walk chained in your promises

ज़हन में तेरे वादों की जँजीर लिए फिरता हूँ ,
सीनें में पर तेरी हसीँ, तस्वीर लिए फिरता हूँ ।

तेरे लफ्ज़ नश्तर से चुभे हैं गहराई तक मुझे ,
मगर बेहया बेशर्म सा, ज़मीर लिए फिरता हूँ ।

अहमो हस्ती का है, मिटना इश्क़ में लाज़िमी ,
तभी तेरे फ़रमान की, तामील किये फिरता हूँ ।

आकर तेरी ज़िंदगी को भी दोज़ख बना दिया ,
माथे पर इतनीं काली, लकीर लिए फिरता हूँ ।

तूनें मेरे किरदार को, पहचाना पूरा ही दरुस्त ,
धोखे में थे लोग कि, तकदीर लिए फिरता हूँ ।

घायल हूँ दिलो- रूह से, पर फिर भी शाद हूँ ,
क्योंकि तेरी यादों की, जागीर लिए फिरता हूँ।।
-------------------मनोज मैहता-------------------

Friday, 11 September 2015

You are writing against justice

इंसाफ के खिलाफ ही तंत्र के हक में लिखनें लगा ,
बात पक्का तय है कि वो शख्स अब बिकनें लगा ।

वज़ूद तेरा यार मेरे, तेरी कलम और स्याही में था ,
कलम गिरवी हो गई तो यह खुद ही मिटनें लगा  ।

शायरों और लेखकों का तो शौक था फ़ाकाकशी ,
पेट लबालब भर गया तब जज़्वा वो मिटनें लगा ।

चेहरों पर नकाबें पहन लीं या मुखौटे चढ़ा लिये ,
बासी अखबार में पर असल चेहरा दिखनें लगा ।

जम्हूरियत की आबरु, चँद हुक्मरानों नें लूट ली ,
और चौथा स्तँभ भी इसी छत्त तले टिकनें लगा ।
------------------- मनोज मैहता ----------------------

I forewarn you...!!

जलज़लों में अचल पत्थर हिल भी जाते हैं ,
टकरा कर मौज़ों से रेत में मिल भी जाते हैं ।

मर्द जात का भरोसा कम ही कीजिये हुज़ूर,
जरा सी आँच पर मोम से पिघल भी जाते हैं ।

उसको रहनें दो मदमस्त, तुम उसके ग़रूर में,
मरते वक्त चींटिंयों के पर निकल ही आते हैं ।

मेरी बकवास पर न यूँही रूठ जाया कीजिये,
क्या करूँ लफ़्ज़ जुबाँ से फिसल भी जाते हैं ।

हम सनकी हैं थोड़े, है ढँग से यह मालूम तुझे
वक्त आनें पे विरह का विष निगल भी जाते हैं

हमें छोडके़ थामा दूजे काे, ग़म हमें न है कोई
कुछ देर साथ देनें को, साथी मिल भी जाते हैं
------------------- मनोज मैहता --------------------

Thursday, 10 September 2015

Your betrayal

दिल की बात आपको क्यों सुनाई न दे?
छलका प्यार नज़रों में भी दिखाई न दे ।

मेरी वफ़ा तेरी ज़फ़ा का अजब मेल है ,
इस करिश्में की तो ख़ुदा भी दुहाई न दे ।

इश्क- मुहब्बत का यारो गज़ब खेल है ,
इसमें अच्छा या बुरा कुछ दिखाई न दे ।

छोड़ कर महफ़िलें अकेले बैठे हैं हम ,
बड़ी लम्बी भी या रब्ब तू जुदाई न दे।

उनकी हरकत से ख़ासा हूँ परेशान मैं ,
यह काम उन्हें कहीं मेरी रुसवाई न दे ।

सोच सोच कर पागल ही हो जाऊँ मैं,
एै रब्ब इतनी भी तू मुझे तन्हाई न दे ।।

-------------मनोज मैहता ------------------

Wednesday, 9 September 2015

Please speak something


                    ... बोलिए. ......
किबाड़ अपनें दिल के यार धीरे धीरे खोलिये
हाँ नहीं तो न ही सही मगर कुछ तो बोलिए

आपके ही इश्क़ में तो, फिरता हूँ मैं बेकरार
फेरकर अपनी निगाहें न हस्ती को झिंझोड़िए

देखा मुस्कुराकर उसे जैसे दिलनशीं हो बड़ा
हम भी तो ठीक ठीक हैं, कम न ऐसे तोलिये

राज़-ए-दिल हरेक मैंनें, आपसे साझा किया
अब यूँ खामोश रहकर, मन को न टटोलिये

कातिल निगाहें आपकी कर रहीं हैं मारकाट
हमें काट ही डालिये ,मुर्दा हैं कब के हो लिये

सित्तम भी तो आपके, नई अदा ही लगते हैं
और ज़ुल्म ढा दीजिए, इक बार हँस के बोलिए

Wednesday, 2 September 2015

Don't think a lot...

सोच्ची सोच्ची किछ नीं बणनाँ कम्म जे तैं किछ नीं करना
मनें मसोसी किह़िंयाँ जीणाँ, बाझ़ी मौत्ती किह़िंयाँ मरना?

उप्परे आल़े दिया मर्जिया गाँह़ ता तेरी मेरी पेश नीं चलणीं
फिरी कैह़दी चिंता ह़ै तिज्जो, जे़ड़ा बणना ठीक ह़ी बणना

लोक्काँ दी गप्पाँ नीं लगणाँ, खोप्पर ता तिज्जो भी दित्तया
गरीबाँ दी भी सुणाँ कर मोआ,अपणाँ ह़ी बस घ़र नीं भ़रना

प्रीत जे कुथकी लग्गी जाए, दिलडुएँ कोह़की बस्सी जाए
अन्दर अन्दर कितणां कुढनां, जमानें ते कितणा की डरना

कद्दी कद्दी मन उखड़ी जादाँ, रैह़ भौंएं कोह़की पतियाँदा
अपण मता किछ सोचणां पौंद्दा, इह़ियाँ भी बाबे नीं बणनाँ

ऐस्सियाँ गप्पाँ गलाई बैह़ँदा, काल़जुए बिच ह़ी आई रैह़ँदा
उह़ियाँ भी सरीफ ह़ै मैहता, इकदम मनें ते किह़िंयाँ कढणां

----------------------- मनोज मैहता ------------------------

Tuesday, 1 September 2015

I am happy to be ruined

इश्क भी शै है यारो बिलकुल अजीब सी ,
तौहीन इसमें होती है, अक्सर गरीब की ।

समझायें क्या उन्हें, है पक्का यकीं जिन्हें,
कि जिंदगी हमारी, ख़ुद है बेतरतीब सी ।।

फ़ासले बढ़ते गए जितना हम चलते रहे ,
दूर हुई मँज़िल लगती थी जो करीब सी ।।।

बेकार की दलाली में हाथ ऐसे रँग लिए ,
धूमिल ही हो गई, लकीर मेरे नसीब की।।

ख़ाक होकर भी मैं शाद हुआ फिरता हूँ ,
यह होना तय था रज़ा थी यही रकीब की ।।
------------------मनोज मैहता ----------------------

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...