जलज़लों में अचल पत्थर हिल भी जाते हैं ,
टकरा कर मौज़ों से रेत में मिल भी जाते हैं ।
मर्द जात का भरोसा कम ही कीजिये हुज़ूर,
जरा सी आँच पर मोम से पिघल भी जाते हैं ।
उसको रहनें दो मदमस्त, तुम उसके ग़रूर में,
मरते वक्त चींटिंयों के पर निकल ही आते हैं ।
मेरी बकवास पर न यूँही रूठ जाया कीजिये,
क्या करूँ लफ़्ज़ जुबाँ से फिसल भी जाते हैं ।
हम सनकी हैं थोड़े, है ढँग से यह मालूम तुझे
वक्त आनें पे विरह का विष निगल भी जाते हैं
हमें छोडके़ थामा दूजे काे, ग़म हमें न है कोई
कुछ देर साथ देनें को, साथी मिल भी जाते हैं
------------------- मनोज मैहता --------------------
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