Wednesday, 30 November 2016

मेरे यार बदल गये .. !!

बदलनी थी कश्ती वो पतवार बदल गये
बिन बात ही क्योंकर मेरे यार बदल गये

सर्द रुत में जब खुष्क- ठंड ने तंग किया
राख में यकायक सभी अँगार बदल गये

कहते तो थे मेरी हर- सू चाहत रखेंगे वो
बे वक्त मगर झट से तलबगार बदल गये

इस शहर में कहाँ ढूँढूं  उनका मुकान मैं
गलियाँ छोड़िये सब  घर-द्वार बदल गये

यकीं अब ख़ुद्दारों पर भी होने लगा कम
हैं इस कद्र आजकल किरदार बदल गये

शिरीफराद, लैलामजनूँ छोड़ दे अब यार
बदला वक्त तो सभी  फ़नकार बदल गये

दौर ही कुछ ऐसा है  तू भी तो अब बदल
सब में है यह मत सोच  दो चार बदल गये
                                  
                                   .. मनोज मैहता

Monday, 21 November 2016

मिटाऊँ कैसे ??

उनके ज़हन से वहम को मैं मिटाऊँ कैसे
बसी हैं दिल में वोही मेरे ये दिखाऊँ कैसे

सुकून पाया है तेरे ही गेसुओं की छांव में
इस ढलान में तपती धूप में मैं जाऊँ कैसे

अलग सी ही मायूसी नें घेर लिया है मुझे
कोशिशें नाकाम हुईं खिल-खिलाऊँ कैसे

सहमा सा जी रहा हूँ तू भी जानती तो है
इससे ज्यादा मेरी हस्ती को मिटाऊँ कैसे

दरिया के जैसे बहना तो  आदत थी मेरी
अँदाज़-ए-ख़ास अपना  और दबाऊँ कैसे

यह मेरे वश में है कि न ख़्वाब कोई देखूँ
तू बता कि ग़ैरों के ख़ाबों में न आऊँ कैसे

                                  .. मनोज मैहता

Sunday, 13 November 2016

मैं भारत का लोक हूँ....!! !!

विचारों के आवेग को कैसे भीतर रोक लूँ
लेखनी की स्याही यूँ ही क्यों कर सोख दूँ

गली का हो फालतू या कि घर का पालतू
कुत्ता बनना है मुझे जब भी चाहे भौंक लूँ

दुश्मन कुछ कहता रहे दिल पर बहता रहे
इतनी हिम्मत बख्शना हर बुरे को टोक दूँ

हरेक गलत सँदेश को  वैर और विद्वेष को
फैलने से रोकने को संपूर्ण ताक़त झोंक दूँ

छोटी छोटी भ्राँतियाँ मिटा देती हैं क्राँतियाँ
ऐसी अफवाहों को खुद के दम पर रोक दूँ

साजिश चाहे गहरी हो सजग हर प्रहरी हो
देश पर मर मिटनें का पैदा तो कर शौक दूँ

मैं गर्व नही हूँ दँभ हूँ राष्ट्र का ठोस स्तंभ हूँ
हिंद की गाथा के मैं घड़ता नवीन श्लोक हूँ
......................................................
                                     .. मनोज मैहता

Saturday, 12 November 2016

क्यों तू अकड़ता है .. !! !!

तालीम-ओ-दौलत के नशे में क्यों इतरा के अकड़ता है
जमीन की और झुकने से शख्सियत का भार बढ़ता है

कुदरत के कायदे को तू इन हरे दरख़्तों से ही सीख ले
कैसे झुक जाते हैं ये नीचे जब फूलों पर फल पड़ता है

आते हैं ग़र्दिश में भी सितारे बुलंदियों का ना ग़ुमाँ कर
सूरज को ही देख ले  किस कदर डूबता और चढ़ता है

यह ओहदा ये पदवियाँ  ये रंग-ओ-लिबास-ओ डिग्रियाँ
सब ही तो यहीं रह जाता है  जब मुर्दा कब्र में गढ़ता है

क्या तीक्ष्ण नैन-ओ-नक्श हैं  या कि मस्त उन्नत वक्ष हैं
असलियत में ये सारा चमड़ा है जो धीरे- धीरे सड़ता है

                                                    .. मनोज मैहता

Wednesday, 9 November 2016

लाल सैल्ले नोट जी


जिसदे भ़ी दिले बिच बस्सया था खोट जी,
तिन्नीं ह़ी कठेरयो थे, लाल- सैल्ले नोट जी|

रातो रात ह़ी रद्दिया दे बणीं गयै एह़ टुकड़े ,
काल़े ध़नें वाल़याँ जो बज्जी खरी चोट जी|

कजो थे लुकायो मयो ह़ँड्डुआँ पारुआँ च,
ढिड्डे जो तां चाह़िदे बस इक दो ह़ी रोट जी|

बैंकाँ डाखान्नायाँ बिच, कितणें करांगे जमा,
दिख्नयो टिरी पौणें ह़ैन कईयाँ दे लंगोट जी|

बगानियाँ नाराँ बझ़ोंदिंयाँ बस ह़ूरां- परियाँ,
अपणी लाड़ी कजो लग्गे निरी मदरोट जी ?

Sunday, 6 November 2016

होशियार...

छोटी सी बात देखिये बेवज़ह बड़ी कर डाली है
अपनी जिम्मेवारी आपनें बेहतर वैसे संभाली है

हक़ तो हमें भी है मिला कि करें आपसे ये गिला
नाहक़ ही क्यूँ हरीफ़ों की औकात बढ़ा डाली है

मरते हैं तेरे कहने पे कुछ उनके पास भी रहने दे
मौका-परस्तों नें कैसे आसपास भीड़ जुटा ली है

हम तो ठहरे तेरे ज़ाहिद,  बने रहेंगे सदा कासिद
मगर न जाने क्यों तूनें ख़ुद हमसे दूरी बढ़ा ली है

चँद बिना कुछ किये हुये बैठे हैं ऊँची मीनारों पर
अपनी तो टूटी थाली है  तो टूटी हुई ही प्याली है
                                             .. मनोज मैहता

Thursday, 3 November 2016

गिदड़ शेरे पर चढ़ाई करा दा.. !!

अपणें मुँह़ें अपणीं ह़ी एड्डी बड़ाई करा दा,
जिंह़ियाँ कि गिदड़ शेरे पर चढ़ाई करा दा |

बरसातड़ नाल़े च रती के पाणीं जे बधया,
खप्प एह़़ पाईयो समुंदरे नें लड़ाई करा दा |

पिट्ठु बजनें ते जादा चुकाया मूह़्ंडया पर,
बणीं ग्या जागत खोत्ता कि पढ़ाई करा दा |

आलुआँ दे सारे बीज उजाड़ी छड्डे सूरां ह़ी,
दस मेया खेल़ाँ पाई कैसदी गुडाई करा दा |

लोक्काँ जो आदत ह़ै भेड़- चाल चलने दी,
कजो बेह़ली ह़ी मोआ दौड़-दड़ाई करा दा |

मैह़ता मेया नियाँ ता खरदियाँ ह़ी जादियाँ ,
कजो कंधाँ लकोल़ूआँ दी रगड़ाई करा दा |
                                    .. मनोज मैहता

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...