बदलनी थी कश्ती वो पतवार बदल गये
बिन बात ही क्योंकर मेरे यार बदल गये
सर्द रुत में जब खुष्क- ठंड ने तंग किया
राख में यकायक सभी अँगार बदल गये
कहते तो थे मेरी हर- सू चाहत रखेंगे वो
बे वक्त मगर झट से तलबगार बदल गये
इस शहर में कहाँ ढूँढूं उनका मुकान मैं
गलियाँ छोड़िये सब घर-द्वार बदल गये
यकीं अब ख़ुद्दारों पर भी होने लगा कम
हैं इस कद्र आजकल किरदार बदल गये
शिरीफराद, लैलामजनूँ छोड़ दे अब यार
बदला वक्त तो सभी फ़नकार बदल गये
दौर ही कुछ ऐसा है तू भी तो अब बदल
सब में है यह मत सोच दो चार बदल गये
.. मनोज मैहता