Monday, 21 November 2016

मिटाऊँ कैसे ??

उनके ज़हन से वहम को मैं मिटाऊँ कैसे
बसी हैं दिल में वोही मेरे ये दिखाऊँ कैसे

सुकून पाया है तेरे ही गेसुओं की छांव में
इस ढलान में तपती धूप में मैं जाऊँ कैसे

अलग सी ही मायूसी नें घेर लिया है मुझे
कोशिशें नाकाम हुईं खिल-खिलाऊँ कैसे

सहमा सा जी रहा हूँ तू भी जानती तो है
इससे ज्यादा मेरी हस्ती को मिटाऊँ कैसे

दरिया के जैसे बहना तो  आदत थी मेरी
अँदाज़-ए-ख़ास अपना  और दबाऊँ कैसे

यह मेरे वश में है कि न ख़्वाब कोई देखूँ
तू बता कि ग़ैरों के ख़ाबों में न आऊँ कैसे

                                  .. मनोज मैहता

No comments:

Post a Comment

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...