नारी-पक्ष
बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती,
ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती।
बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की देखो चाल,
मीनाक्षी, ऊमा, ममता, मनीषा—पाती कहाँ खुद को संभाल।
पुरुष-पक्ष
विनोद, बलदेव, सुखदेव—
पगड़ियों में लगते भाई मतिदास।
जॉनी, राजेंद्र, अतुल, अंकुश—
बिखरा रहे बालमुकुंद-सा प्रकाश।
सुरेंद्र और अनिल लग रहे साक्षात लक्ष्मी दीवान,
सूर्य-सा तेज बिखेर रहे हैं,
भृगु-वंशी सब महान।
आशीर्वाद-पक्ष
विमला, विद्या, कमला—
आकाश से पुष्प बरसायें।
घनश्याम और बलराज—
अनंत दुआएँ भेजते आयें।
उत्सव-पक्ष
गुलशन, राजेश, राकेश—
सब वैद मोहयाल सिरमौर।
कर्ण, रजत, आदित्य, कुनाल—
उल्लास की न कोई छोर।
सचिन, मनू, लोकेश—
मना रहे हैं उल्लास अपार।
कमलेश, बीना, अनीता—
आज सजी हैं विशेष श्रृंगार।
नव-पल्लव
अंकिता को आज भी चिय्या करती परेशान,
ममता मगर महेंद्र संग बनी विशेष मेहमान।
आशीष, साहिल, बक्सरियों ने छेड़ी है मधुर तान,
अनू, चाहत और गुगलू हैं इस उत्सव की जान।
स्मृति-पक्ष
सबको देख भार कर रजनी मधुर मुस्कायें,
पदमा, सुदेश, पायल, शीतल—चुनरिया लहरायें।
भूषण, काके, शम्मी—बिना दिल तो न लग पाये,
वीराबाली और पप्पू की याद बहुत ही आये।
दीपक, दीपा, मोहन—इनका है विशेष उल्लेख,
रमेश, उर्मिला, नीलम—कर रहे सबकी देखरेख।
राजू, शौक्की, लवली—अब नहीं हैं हमारे बीच,
लेकिन उनके अनुराग लगातार रहे हमें सींच।
सरनदास, धनराज—बिना हमें कहाँ है चैन,
उनकी याद में आज भी छमछम बरसते नैन।
समापन
संग-संग जब जुड़ें सब नाते,
गूँज उठे रस, रंग और गान।
नारी की कोमल करुणा संग,
पुरुष का पराक्रम ले महान।
यह उत्सव नहीं केवल उत्सव,
यह वंशगाथा का अमर प्रमाण।
भृगु-वृक्ष की हर शाखा से झरता,
स्नेह, प्रकाश और कल्याण।
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