Monday, 8 September 2025



शनैः शनैः अपने रूप से सबको मोहित करती है
वो मेरी दुश्मन देखो यारों मेरे ही दिल में बसती है

आँखें हैं बिल्लौरी और कमर ज्यों हो कमान
फूल बरसने लगते हैं जब जब वो पगली हंसती है

चाल में मदहोशी और शहद है उसकी बोली में
जिसे सुनकर पत्थरों में भी मोहब्बत धड़कने लगती है

नफ़रत के नाम पर रिश्ता शुरू तो हुआ था यारों
अब उसकी हर अदा मेरे अरमानों में बसती है

उसकी जुल्फ़ों की घटा जब भी मुझ पर छा जाती है
रूह मेरी बेक़रारी में सौ बार बिखर जाती है

गाल उसके गुलाबों से भी बढ़कर लगते हैं
उसकी नज़रों से तो जन्नत के दर खुलते हैं

जब भी नज़ाकत से वो पलकों को झुका लेती है
मेरे दिल की दुनिया में हलचल-सी मच जाती है

कभी वो शोख़ी से दिल तोड़कर चली जाती है
कभी अपनी मासूमियत से फिर लौटा भी लाती है

मेरी हर तन्हाई अब उसकी याद में ढलती है
हर धड़कन की रागिनी अब उसी पे सजती है

मैं दुश्मनी निभाऊँ भी तो कैसे निभाऊँ यारों
क्योंकि मेरी हार भी अब उसी के नाम बसती 

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