कब तक तुम यूँ ही झूठ से बहलाते रहोगे,
कब तक सबसे सच्चाई अपनी छिपाते रहोगे।
हर बात में क्यों सच का गला घोंटते हो तुम,
कब तक ख्वाबों को ज़हर में नहलाते रहोगे।
आईना देखो, वो भी सवाल करता है अब,
कब तक ख़ुद से नज़रें चुराते रहोगे।
लब चुप , मगर आँखों में तूफ़ान क्यों है?
कब तक दर्द यूँ ही दिल में दबाते रहोगे?
वो जिनसे मोहब्बत थी, सच सुन न सके कभी,
कब तक उन्हें भी मीठे झूठ सुनाते रहोगे?
ज़िंदगी कोई पर्दा नहीं, जिसे हटाना ना हो,
कब तक पर्दों के पीछे छिपते जाते रहोगे?
ख़ुद से ही दुश्मनी ये कहाँ की अकलमंदी है,
कब तक खुद को हर बार मिटाते रहोगे?
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