तुम्हें देखे बिना था रहा नहीं जाता
मगर अब मुझे नज़र ही नहीं आता
कभी फूल थे तुम मेरी ज़िन्दगी में
अब तो काँटा भी मगर नहीं आता
तेरी याद में भीग जाती थी पलकें
अब वो सैलाब फिर इधर नहीं आता
कभी भीड़ आती थी इस ही घर में
एक परिंदा भी पर अब नहीं आता
हम उस मोड़ पर रह गए खड़े ही
जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता
किया दिल ने सौदा तुम्हारी वफ़ा का
मगर अब कोई सौगंध भी नहीं खाता
वो लहजा, वो हँसी, वो बातों के मोती
कहीं कुछ भी अब साफ़-साफ़ नहीं भाता
तुम्हीं पूछते थे, "कहो, हाल क्या है?"
अब ख़ैरियत में भी सबर नहीं आता
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