Thursday, 25 September 2025

अब मुझे नज़र ही नहीं आता

तुम्हें देखे बिना था रहा नहीं जाता

 मगर अब मुझे नज़र ही नहीं आता


कभी फूल थे  तुम  मेरी ज़िन्दगी में 

अब तो  काँटा भी  मगर नहीं आता


तेरी  याद  में भीग  जाती थी पलकें 

अब वो सैलाब फिर इधर नहीं आता


कभी भीड़ आती थी इस ही घर में 

एक परिंदा भी पर अब नहीं आता


हम उस मोड़ पर रह गए खड़े ही 

जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता


किया दिल ने सौदा तुम्हारी वफ़ा का

मगर अब कोई सौगंध भी नहीं खाता


वो लहजा, वो हँसी, वो बातों के मोती 

कहीं कुछ भी अब साफ़-साफ़ नहीं भाता


तुम्हीं पूछते थे, "कहो, हाल क्या है?" 

अब ख़ैरियत में भी सबर नहीं आता





No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...