Wednesday, 10 September 2025

रावण कुंभकर्ण संवाद



रावण – कुंभकर्ण संवाद

रावण:
भ्राता, आज घोर संकट लंका पर छाया है,
वनवासी राम ने संगिनी संग डेरा जमाया है।
वानरों का हुजूम समुद्र लांघ चला आया,
मेरे बल–पराक्रम का मानो मान घटाया।

क्या अनुचित, क्या उचित – अब कुछ सोचूँ न मैं,
केवल रण की ज्वाला में ही खोजूँ न मैं।
कुंभकर्ण! उठो, और शत्रु का नाश करो,
मेरे अपमान का तुम प्रतिशोध करो।


कुंभकर्ण:
भ्राता रावण! सत्य सुनो, मैं कुछ कहूँ,
सुभ और अशुभ में भेद अभी भी मैं देखूँ।
सीता–हरण कर तुमने धर्म से नाता तोड़ा,
यही है मूल, जिससे संकट ने घेरा जोड़ा।

राम कोई साधारण नर नहीं, विष्णु का अंश हैं,
उनसे वैर बाँधना विपत्ति को निमंत्रण है।
तुम्हारा अहंकार लंका को संकट में डाले,
मैं देख रहा हूँ सर्वनाश की छाया काले।


रावण (क्रोधित):
भ्राता! यह क्या, तुम भी मेरा उत्साह गिराते हो?
शत्रु की महिमा गाकर मुझे ही समझाते हो?
क्या रावण की शक्ति को तुमने भुला दिया,
या नींद ने विवेक तुम्हारा हर लिया?


कुंभकर्ण (गंभीर):
नहीं भ्राता! तुम्हारी शक्ति में मेरा संदेह नहीं,
पर धर्म–विरुद्ध विजय का कोई पथ सही नहीं।
अब जब युद्ध अपरिहार्य है, तो मैं तैयार हूँ,
तेरे साथ रणभूमि में मरने को तत्पर हूँ।

परन्तु स्मरण रखो, मैंने कर्तव्य कह दिया,
सत्य का दर्पण तुम्हारे सम्मुख रख दिया।



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