मैं जोधा हूँ… राजपथों पर जन्मी,
जहाँ तलवारें झुके बिना चलती थीं,
जहाँ सूर्य को नमन कर रानियाँ जलती थीं,
वहीं मैं… सौदे की शांति में पलती थी।
मुझे ब्याहा नहीं गया — मुझे भेजा गया था,
राजा नहीं, पिता भी नहीं…
मेरे स्वाभिमान को संग्राम से बचाने वाले वे सब —
मुझमें ही युद्ध हार बैठे थे कहीं।
अकबर महान कहा गया —
हाँ, उसने मुझे मरियम-उज़-ज़मानी कहा,
पर कोई नहीं समझा —
मेरे हर नाम में मेरी हार क्यों छिपी थी भला?
कभी गंगा जल छूने से रोका गया,
कभी तुलसी दल को हटाया गया,
और जब मैंने पूछा —
"क्या मेरी पूजा अब गुनाह है?"
तो इतिहास मुस्कराया… और चुप रह गया।
मेरे घूँघट में सिंदूर नहीं था,
कुंदन था, पर माँ का आशीर्वाद नहीं था।
महल था, पर अपना मंदिर नहीं,
और बेटा था — पर माँ की वाणी में वेद की गूंज नहीं।
मैंने हर रोज़ अपने ईष्ट को
अंतस में जलाया, दीप की तरह।
और बाहर — मुस्कान ओढ़ ली…
कि रानी हूँ, बग़ावत नहीं कर सकती।
"जोधा-अकबर" का प्रेम अमर है —
कहते हैं लोग...
पर मेरी आत्मा आज भी पूछती है —
क्या किसी ने मेरी स्वीकृति पूछी थी एक बार भी…?
🔱 "हिंदू थी मैं — और हूँ आज भी"
ना मैं घृणा माँगती हूँ, ना बदला,
मैं बस अपने देवताओं की वापसी चाहती हूँ,
इतिहास की किताबों में मेरे पन्ने नहीं,
मेरे आँसुओं की असल स्याही होनी चाहिए।
मैं जोधा हूँ — तुम्हारी माँ, बहन, रानी,
एक हिंदू कन्या, बलिदान की निशानी।
मुझे मत पूजो, बस मुझे समझो,
कि अगली बार कोई स्त्री केवल 'संधि' ना बने।
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