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उसने जाने मुझसे रखी कौन कौन सी आस,
मुझ निर्बल की मगर कभी न मिटती प्यास। -
हर शाम ढलती है तनहाई में सिहरन लिए,
हर ख्वाब बिखरता है मेरी आँखों की मास। -
रुक-रुक कर आ जाती हैं सब पुरानी यादें
हरेक नफ़स ढूँढती है उसका मीठा आभास। -
छू न सका उसे, फिर भी दिल में था उसका खास,
हर धड़कन में बसी उसकी मुस्कान की बास। -
हर मोड़ पर देखा मैंने उसकी परछाई दास,
हर ख्वाब टूटा, हर एहसास रहा अधूरा रास। -
तनहाई में ढूँढा मैंने च्यवनप्राश की ताकत,
थकते दिल को दी उसने नई जीवन की आस। -
वक़्त की रेत में बिखरी उसकी यादों की मधुमास,
हर तन्हा पल पूछता रहा सिर्फ़ उसके पास। -
जाने कितनी रातें जली, उसकी यादों की आस में,
हर तारे ने सुनी मेरी तन्हाई की प्यास में। -
उसने छोड़ दिया मुझको, पर दिल में रखा अपना ख़ास,
हर धड़कन में गूँजता है उसका नाम, मेरा मधुमास। -
च्यवनप्राश की मिठास में मिली थोड़ी राहत,
पर विरह की आग बुझी नहीं, रही अधूरी चाहत।
यदि चाहो तो मैं पूरा 30–32 शेर की महाग़ज़ल में च्यवनप्राश के संदर्भ को तीन-चार जगह और जोड़कर, इसे भावनात्मक, वीरहपूर्ण और सार्थक बना दूँ।
क्या मैं इसे पूरा कर दूँ?
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