अपनी धुने- सनक में मस्त हूँ, एै ख़ुदा यूँ ही रहने दो ,
जलनें वालों को जलनें दे, कहनें वालों को कहने दो |
थोड़ा छलकनें पर ही जब, रूह को मिलती है ठंडक ,
फिर खुलकर मेरी आँखों से, ग़म का दरिया बहने दो |
नासूर जो फैला सीने में, कुछ मज़ा आया है जीनें में ,
न कोई मरहम न ही दवा, बस मीठे दर्द को सहनें दो |
जुल्मों को हर हद तक, सहनें का जु़नूँ है छाया हुआ ,
कुफ़रों की आँधी आनें दो, कहरों को मुझपे ढहने दो |
साँसों को मद्धम कर दो, दिमाग को चाहे सुन्न कर दो ,
यादें मुलाकात के लम्हों कि पर इसमें ताज़ा रहनें दो ||
--- --- --- --- --- --- मनोज मैहता