सोचा था मसीहा है लेकिन मदारी निकला,
वालिद की तरह बेटा भी व्यापारी निकला।
भागकर जहाँ पनाह लेनें की, की कोशिश,
उस मुकाँ का वाशिंदा ही शिकारी निकला।
माँगता इमदाद क्या, मैं उस शख्स से यारो,
भेष में नवाब के ख़ुद वो भिखारी निकला।
दूसरों को फतह की तरकीबें बताने वाला,
दिल की बाज़ी हारा इक जुआरी निकला।
मर्ज़ की दवा समझ, जिसे लिये फिरते रहा,
वो ही लिफाफा तो, वज़हे बीमारी निकला।
-------------------- मनोज मैहता---------------
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