Thursday, 29 December 2016

सुणां जी ... !! !!

केवलुए जो मेजरे नें घुल़ाँदा, सुरेशेे पिच्छे कौशले लाँदा
अप्पु बणदा चिट्टा चल़ेरा, ह़ोरनी जो काल़ी भ़ेड गलाँदा

जेह़ड़ा नेता बध़णा लग्गे, इस बिच नुक्साँ कढणां लग्गे 
तिस्दयाँ बागियाँ तोपी तोपी, मूड़े अपणें बिच बठियांदा

सारे डग्ग इन्नीं मुँह़ें लायो तां खरे खरे वर्कर खुड्डें लायो
दूँ दूँ लख्खाँ नें ह़ारयो जेहड़े, तिनां जो चेयरमैन बणांदा

कम करदा डिक्टेटरे साह़ीं, कुसी दी नीं सुणदा सणांदा
घ़ोड़यां ते तारी कईयाँ जो खोत्तयां पर भ़ी एह़ बठियांदा

कद्दी चंद्रेशा कद्दी विद्या पर, ह़ुण बालिये पर तीर चलाँदा
अप्पु ह़ै एह़ काल़ा भेड्डु, ह़ोरनी जो काल़ी भ़ेड गलाँदा

गध़यां पर बेह़्ई खुस ह़ोयो, दै़ नौल़ भी किच्छ कठरोयो
चौबिंहाँ साल्लां दे पुत्रे दे, सैह़ जबरयाँ ते पैराँ बँदौआंदा

छडी देया इद्दे खेह़ड़े मितरो, बड़े खलड़ू इन्नीं पेड़े मितरो
ह़िमाचले देयो भ़लयो लोक्को, फारका ऐह़ी गप्प गलाँदा

सुखराम जी इन्नीं फसवाये, सत मह़ाजन भी तां हरवाये
साजशाँ रचदा सबनीं खलाफ कनें बड्डा कांग्रेसी कोह़ाँदा

बोलदा उह़ियां मैं नीं कद्दी ह़ारया, ह़र छोटा- बड्डा मारया
रामलाल जी दी याद दोआईये फिरी झट चुप ह़ोई जाँदा

बणदा बड्डा अजीत बिह़ारी, अपणीं लाड़ी दो बरी ह़ारी
ह़ाखीं दस्सिये ता फट कम्बदा, जरकयाँ जो बड़ा डराँदा

Tuesday, 27 December 2016

गीदड़ का मुखिया ही होने वाला ढेर है

रूको जी बस गिनेचुने दिनों का फेर है
गीदड़ का मुखिया ही होने वाला ढेर है

ईश्वर की लाठी की, आवाज़ नही होती
उसके घर में देर सही पर नहीं अंधेर है

बच्चों सी हरकतें व  कायराना फितरतें
वह मेंडक नही महज़ 'कुएँ' की मुंडेर है

कुटिल सी मुस्कान  'ओ गधे' पहलवान
वाह! कैसा शिगूफा छोड़ा कि 'तू' शेर है

दौड़ता है यह सरपट  बदल कर करवट
वक्त बतायेगा कि तू तीतर है या बटेर है

मेमना ख़ुद को शेर है पुकारता .. !!

कितनी बड़ी शेखी है  बघारता
मेमना ख़ुद को शेर है पुकारता

ईमानदारी का चोला ओढ़ कर
करोड़ों की जमीनें है डकारता

गीदड़ जैसी करके चालाकियाँ
बेगाने माल पर  हाथ है मारता

भगौड़ा एक जी 'कीर-ग्राम' का
दूसरों के कँधों पर  ललकारता

भोले धर्मशालियों को ठग कर
रिश्तेदारों के 'मुकद्दर' संवारता

तेरा रहनुमां ग़र होता 'काबिल'
तो एक भी पिछलग्गु न हारता
                    .. मनोज मैहता

Monday, 26 December 2016

न आना उसके बहकावे में .. !! !!

साज़िश की बू आती है उसके मन्नोवल और बुलावे में
देखना फिर से न आ जाना उस शातिर के बहकावे में

ये दिलकश मुस्कुराहट, ये मासूमियत या लड़खड़ाहट
भूल से भी मत फंसना  उसके नुमायशनुमा दिखावे में

हमसे मिलना ज़रूरी ही है तो बड़े शौक से आ जाईये
हम होंगे या तो मय-खाने पर या मिलेंगे फिर ख़राबे में

कहना तो बहुत कुछ चाहा  पर बात नहीं जी बन पाई
आवाज ही अपनी दब गई  उस कातिल शोर शराबे में

अल्लाह तो ऐ काफ़िर  तेरे दिल के भीतर ही बसता है
उसको कहाँ ढूँढता फिरता है जाकर काशी या काबे में
                                                     .. मनोज मैहता

Sunday, 25 December 2016

रणभेरी .. .. !! !!

धृतराष्ट्र की अनैतिक औलाद
करके ही रहेगी उसको वर्बाद

बना हिमाचल लो हस्तिनापुर
फैल चुका  दिमाग तक मवाद

अर्जुन को रोकने की कोशिशें
अपना गणित या मूर्खी हिसाब

धर्मशाला जब बना है कुरुक्षेत्र
नगरोटा है पांडवों का शंखनाद

बज उठी हैं तीक्ष्ण रण-भेरियाँ
कायर स्वयंमेव करेंगे आंतर्नाद

कांपते हाथों से  फैंकी गोटियाँ
द्यूत क्रीडा में भी खायेगा मात

सत्ता के नशे में पूरा अँधा हुआ
दो राज घरानों का बूढ़ा दामाद

षडयंत्रो से नही होगी हार-जीत
हम तो मारकाट को हैं आज़ाद

उठा गांडीव अचूक तू प्रहार कर
त्रिगर्त फिर जो करना है आबाद ||

Tuesday, 20 December 2016

हम बाली के काम पे माँगेंगे... !! !!

जाति के नाम पे माँगेंगे पाति के नाम पे माँगेंगे
कभी तो सुबह पर माँगेंगे  कभी शाम पे माँगेंगे

बहलाते- फुसलाते फिरें  फर्क नही पड़ता यारो
निश्चय पक्का है अपना  हम तो काम पे  माँगेंगे

बातों को सुनते आना पर  यह भी समझा आना
उनके जैसे और भी हैं जोकि बस जाम पे माँगेंगे

जज़्वातों में नही बहते, चँद ऐसे लोग भी हैं रहते
जो भी करना हैं करें वो हम इसी पैग़ाम पे माँगेंगे

उनका नाम चलाने में  महफ़िलों में मय खानों में
जो लिखा और बोला है उस ही कलाम पे माँगेंगे

उनको भी चाहियें वोट पर नीयत में ज़रा है खोट
कई हथकंडे अपनायेंगे, या वो इल्ज़ाम पे माँगेंगे

Monday, 19 December 2016

आपके हालात की मौज ले रहे हैं .. !!

कितनी गलत सोच है कि मुश्किलों का बोझ ले रहे हैं
असल में कुछ लोग आपके हालात की मौज ले रहे हैं

बैठे ही थे वो इसी तलाश में कि हंगामा तो कहीं बरपे
जायज़ा सुबह-दोपहर-शाम आपका तो रोज ले रहे हैं

नुकसान इसका होगा किसे  यह भी काबिल-ऐ-गौर है
इस चीज की भी मेरे यारो  क्या तनिक खोज ले रहे हैं

मतलब परस्त चंद, जो मँडरा रहे है इर्द-गिर्द इन दिनो
पता है मुझे भी सब कुछ  कि क्या क्या लोभ दे रहे हैं

तेरा फ़र्ज़ है आगाह करना  कि जागो और काम करो
बहुत हसीन ख़्वाब लोग  इन दिनों ऐ मनोज ले रहे हैं ||

Tuesday, 13 December 2016

हमें बेवफ़ाई नही आती .. !! !!

सब चीज आती है हमें पर बेवफ़ाई नही आती
हर बात दिल की पर ज़ुबाँ पर लाई नही जाती

तेरी ज़फा का ज़िक्र ख़ुद बता किससे करें हम
हमसे ऐसी आग-ओ-हवा भड़काई नही जाती

रिश्ते की इस नाज़ुक डोर को उलझने ना देना
फिर ता उम्र ऐसी सिलवटें सुलझाई नही जाती

माना कि हसीन दौर में  दाखिल तुम हो गये हो
पर अतीत के सायों से  जान छुड़ाई नही जाती

वक्त के साथ कुछ यादें धुंधला सी तो जाती हैं
खरौंचें जिगर की सारी मगर मिटाईं नही जाती

कहने को यों तो 'मनोज' तू बनता है बड़ बोला
पते की बात तुझ से कोई पर बताई नही जाती

यह इश्कबाज़ी ख़ुद कम्बख्त सीखनी है पड़ती
मदरसे में तो यह तालीम  सिखलाई नही जाती
                                          .. मनोज मैहता

मदरसे में यह तालीम सिखाई नही जाती.. !! !!

सब चीज आती है हमें पर बेवफ़ाई नही आती
हर बात दिल की पर ज़ुबाँ पर लाई नही जाती
तेरी ज़फा का ज़िक्र ख़ुद बता किससे करें हम
हमसे ऐसी आग-ओ-हवा  भड़काई नही जाती
रिश्ते की इस नाज़ुक  डोर को उलझने ना देना
फिर ता उम्र ऐसी सिलवटें सुलझाई नही जाती
माना कि हसीन दौर में  दाखिल तुम हो गये हो
पर अतीत के सायों से  जान छुड़ाई नही जाती
वक्त के साथ कुछ यादें  धुंधला सी तो जाती हैं
खरौंचें जिगर की सारी  मगर मिटाईं नही जाती
कहने को यों तो 'मनोज' तू  बनता है बड़ बोला
पते की बात तुझ से कोई  पर बताई नही जाती
यह इश्कबाज़ी ख़ुद  कम्बख्त सीखनी है पड़ती
मदरसों में तो यह तालीम  सिखलाई नही जाती
                                           .. मनोज मैहता

Monday, 12 December 2016

प्रिय बंधु/बहन
                      .. जय हिंद
जैसा कि आप सभी को विदित है कि दिनाँक 8 दिसम्बर 2016 को मेरी पुत्रवधु भूमिका व पुत्र रघुबीर बाली आपके प्रिय जानू के यहाँ एक नन्हें मेहमान का आगमन हुआ है जिससे मुझे दादा बनने का सौभाग्य उपहार के रूप में प्राप्त हुआ है|  नवजात शिशु व मेरी बहू ईश्वर की अनुकंपा व आपकी दुआओं से बिलकुल स्वस्थ हैं |
  .  मैं या मेरा परिवार आज जिस मुकाम पर हैं उसमें आपका अतुलनीय सहयोग व कृपा रही है| आप हर सुख दुख में मेरे साथ चट्टान की तरह खड़े रहते हैं |
मेरे परिवार का कोई भी कार्य आपकी उपस्थिति व शुभ कामनाओं के बिना सम्पन्न नही हो सकता |
..अत: मैंने दिनांक 25 दिसम्बर 2016 को इसके मद्देनज़र अपने पौत्र का नामकरण संस्कार नगरोटा बगवां(गाँधी ग्राउँड) में आपकी मौजूदगी में करने का निर्णय लिया है |
.. आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि इस अवसर पर निम्न कार्यक्रमानुसार पधार कर व मेरे पोते को स्नेहिल आशीर्वाद देकर मेरे पूरे परिवार को कृतार्थ करें
                                                     .. भवदीय
                        .                     
                                               . जी.एस.बाली

कार्यक्रम :

रविवार , 25 दिसम्बर . 11 बजे  नामकरण संस्कार
                                 12 बजे  सांस्कृतिक कार्यक्रम
                  12:30- 3:30 बजे   प्रीति भोज

छोटी सी बात .. !! !!

छोटी सी बात देखिये बेवज़ह बड़ी कर डाली है
अपनी जिम्मेवारी आपनें बेहतर वैसे संभाली है

हक़ तो हमें भी है मिला कि करें तुम से ये गिला
नाहक़ ही क्यूँ हरीफ़ों की औकात बढ़ा डाली है

मरते हैं तेरे कहने पे कुछ उनके पास भी रहने दे
मौका-परस्तों नें कैसे आसपास भीड़ जुटा ली है

हम तो ठहरे तेरे ज़ाहिद बने रहेंगे हर सू कासिद
मगर न जाने क्यों तूनें ख़ुद हमसे दूरी बढ़ा ली है

चँद बिना कुछ किये हुये बैठे हैं ऊँची मीनारों पर
अपनी तो टूटी थाली है  तो टूटी हुई ही प्याली है

                                            .. मनोज मैहता

Sunday, 11 December 2016

Materialism has won

This is materialistic world,
your emotions matter least
even to find enough space,
you've to become a beast
One is measured by money,
loyalty-qualities count least.
Wanna shine in torn clothes,
forget such stupidity at least.
Contentment is astonishment,
they'll gulp you as their feast.
Oligarchy has built it's temple
with leader as it's head priest
poor you need not be worried,
You'll be amputated like cyst

Saturday, 10 December 2016

मुकद्दरों के सहारे .. !! !!

मुकद्दरों के सहारे कितने दिनों तक चलते रहोगे यार
बेगाने माल पर क्या उम्र भर ही तुम पलते रहोगे यार

अपनी हस्ती पर यकीं करके हो जाओ ज़लबाफरोश
दूजे के जलबों से आखिर कब तक छलते रहोगे यार

इक बार तो सीना ठोंककर उनसे आँखें मिलाओ तुम
क्या ज़िंदगी भर ना मुराद दुश्मनों से टलते रहोगे यार

चुभती बातों को हँसी की फ़ज़ाओं में उड़ा दिया करो
इन्हीं आतिशी अल्फ़ाज़ों में नहीं तो जलते रहोगे यार

मौका जब सुनहरी मिल जाये तो भुना भी लिया करो
वक्त निकल जाने के बाद फिर हाथ मलते रहोगे यार

कभी तो इरादों अरमानों की कड़ाही में तेल डाल दो
थूक से ख्याली पकवान कब तलक तलते रहोगे यार


                                                  .. मनोज मैहता

Friday, 9 December 2016

मितरो खुश्क ठंड बुरी

गल्ल पराणी ठीक ह़ै कि काणीं बँड बुरी,
अपण इबकी एह़ मितरो खुश्क ठंड बुरी

समझ़ाणें दी गप्प, फूकी कजो लगाई बो,
तिन्नी भ़रोयो बजारे च करी त्ती झ़ंड बुरी

मिरक मारना बड़ा मयो मंह़गा पेयी गया,
तिसा दे भाऊआँ ते बज्जी ह़ाय फँड बुरी

डाक्टरें जाह़लु ते दसया शुगरा दा खतरा,
तदुँ दी ह़ी बझ़ौदी खसमाखाणी खंड बुरी

मत्थयाँ टेक्का भ़ौंयें चामुण्डा या भ़ौअणें
ढोणा ह़ी पौणीं अपण करमा दी पँड बुरी

पह़लें सारा ध़्याड़ा गीत तिसा दे गांदा था,
जुत्त- पल़ै ह़ोई ताँ बोलादा सैह़ ह़ै रँड बुरी|

मुर्देयाँ उपर नी खिल्लाँ-भ़ान्नाँ दी छँड बुरी,
अपर गुल्ली-डँडे दी भ़ुत्थी कनें भ़टँड बुरी

खाखी पर ह़ै उपड़ेया ऐ़ कोई डिजाईन नी,
खरा घ़सुन्न जवानें दा  पर बुड्ढे दी चँड बुरी
                                     .. मनोज मैहता

Wednesday, 30 November 2016

मेरे यार बदल गये .. !!

बदलनी थी कश्ती वो पतवार बदल गये
बिन बात ही क्योंकर मेरे यार बदल गये

सर्द रुत में जब खुष्क- ठंड ने तंग किया
राख में यकायक सभी अँगार बदल गये

कहते तो थे मेरी हर- सू चाहत रखेंगे वो
बे वक्त मगर झट से तलबगार बदल गये

इस शहर में कहाँ ढूँढूं  उनका मुकान मैं
गलियाँ छोड़िये सब  घर-द्वार बदल गये

यकीं अब ख़ुद्दारों पर भी होने लगा कम
हैं इस कद्र आजकल किरदार बदल गये

शिरीफराद, लैलामजनूँ छोड़ दे अब यार
बदला वक्त तो सभी  फ़नकार बदल गये

दौर ही कुछ ऐसा है  तू भी तो अब बदल
सब में है यह मत सोच  दो चार बदल गये
                                  
                                   .. मनोज मैहता

Monday, 21 November 2016

मिटाऊँ कैसे ??

उनके ज़हन से वहम को मैं मिटाऊँ कैसे
बसी हैं दिल में वोही मेरे ये दिखाऊँ कैसे

सुकून पाया है तेरे ही गेसुओं की छांव में
इस ढलान में तपती धूप में मैं जाऊँ कैसे

अलग सी ही मायूसी नें घेर लिया है मुझे
कोशिशें नाकाम हुईं खिल-खिलाऊँ कैसे

सहमा सा जी रहा हूँ तू भी जानती तो है
इससे ज्यादा मेरी हस्ती को मिटाऊँ कैसे

दरिया के जैसे बहना तो  आदत थी मेरी
अँदाज़-ए-ख़ास अपना  और दबाऊँ कैसे

यह मेरे वश में है कि न ख़्वाब कोई देखूँ
तू बता कि ग़ैरों के ख़ाबों में न आऊँ कैसे

                                  .. मनोज मैहता

Sunday, 13 November 2016

मैं भारत का लोक हूँ....!! !!

विचारों के आवेग को कैसे भीतर रोक लूँ
लेखनी की स्याही यूँ ही क्यों कर सोख दूँ

गली का हो फालतू या कि घर का पालतू
कुत्ता बनना है मुझे जब भी चाहे भौंक लूँ

दुश्मन कुछ कहता रहे दिल पर बहता रहे
इतनी हिम्मत बख्शना हर बुरे को टोक दूँ

हरेक गलत सँदेश को  वैर और विद्वेष को
फैलने से रोकने को संपूर्ण ताक़त झोंक दूँ

छोटी छोटी भ्राँतियाँ मिटा देती हैं क्राँतियाँ
ऐसी अफवाहों को खुद के दम पर रोक दूँ

साजिश चाहे गहरी हो सजग हर प्रहरी हो
देश पर मर मिटनें का पैदा तो कर शौक दूँ

मैं गर्व नही हूँ दँभ हूँ राष्ट्र का ठोस स्तंभ हूँ
हिंद की गाथा के मैं घड़ता नवीन श्लोक हूँ
......................................................
                                     .. मनोज मैहता

Saturday, 12 November 2016

क्यों तू अकड़ता है .. !! !!

तालीम-ओ-दौलत के नशे में क्यों इतरा के अकड़ता है
जमीन की और झुकने से शख्सियत का भार बढ़ता है

कुदरत के कायदे को तू इन हरे दरख़्तों से ही सीख ले
कैसे झुक जाते हैं ये नीचे जब फूलों पर फल पड़ता है

आते हैं ग़र्दिश में भी सितारे बुलंदियों का ना ग़ुमाँ कर
सूरज को ही देख ले  किस कदर डूबता और चढ़ता है

यह ओहदा ये पदवियाँ  ये रंग-ओ-लिबास-ओ डिग्रियाँ
सब ही तो यहीं रह जाता है  जब मुर्दा कब्र में गढ़ता है

क्या तीक्ष्ण नैन-ओ-नक्श हैं  या कि मस्त उन्नत वक्ष हैं
असलियत में ये सारा चमड़ा है जो धीरे- धीरे सड़ता है

                                                    .. मनोज मैहता

Wednesday, 9 November 2016

लाल सैल्ले नोट जी


जिसदे भ़ी दिले बिच बस्सया था खोट जी,
तिन्नीं ह़ी कठेरयो थे, लाल- सैल्ले नोट जी|

रातो रात ह़ी रद्दिया दे बणीं गयै एह़ टुकड़े ,
काल़े ध़नें वाल़याँ जो बज्जी खरी चोट जी|

कजो थे लुकायो मयो ह़ँड्डुआँ पारुआँ च,
ढिड्डे जो तां चाह़िदे बस इक दो ह़ी रोट जी|

बैंकाँ डाखान्नायाँ बिच, कितणें करांगे जमा,
दिख्नयो टिरी पौणें ह़ैन कईयाँ दे लंगोट जी|

बगानियाँ नाराँ बझ़ोंदिंयाँ बस ह़ूरां- परियाँ,
अपणी लाड़ी कजो लग्गे निरी मदरोट जी ?

Sunday, 6 November 2016

होशियार...

छोटी सी बात देखिये बेवज़ह बड़ी कर डाली है
अपनी जिम्मेवारी आपनें बेहतर वैसे संभाली है

हक़ तो हमें भी है मिला कि करें आपसे ये गिला
नाहक़ ही क्यूँ हरीफ़ों की औकात बढ़ा डाली है

मरते हैं तेरे कहने पे कुछ उनके पास भी रहने दे
मौका-परस्तों नें कैसे आसपास भीड़ जुटा ली है

हम तो ठहरे तेरे ज़ाहिद,  बने रहेंगे सदा कासिद
मगर न जाने क्यों तूनें ख़ुद हमसे दूरी बढ़ा ली है

चँद बिना कुछ किये हुये बैठे हैं ऊँची मीनारों पर
अपनी तो टूटी थाली है  तो टूटी हुई ही प्याली है
                                             .. मनोज मैहता

Thursday, 3 November 2016

गिदड़ शेरे पर चढ़ाई करा दा.. !!

अपणें मुँह़ें अपणीं ह़ी एड्डी बड़ाई करा दा,
जिंह़ियाँ कि गिदड़ शेरे पर चढ़ाई करा दा |

बरसातड़ नाल़े च रती के पाणीं जे बधया,
खप्प एह़़ पाईयो समुंदरे नें लड़ाई करा दा |

पिट्ठु बजनें ते जादा चुकाया मूह़्ंडया पर,
बणीं ग्या जागत खोत्ता कि पढ़ाई करा दा |

आलुआँ दे सारे बीज उजाड़ी छड्डे सूरां ह़ी,
दस मेया खेल़ाँ पाई कैसदी गुडाई करा दा |

लोक्काँ जो आदत ह़ै भेड़- चाल चलने दी,
कजो बेह़ली ह़ी मोआ दौड़-दड़ाई करा दा |

मैह़ता मेया नियाँ ता खरदियाँ ह़ी जादियाँ ,
कजो कंधाँ लकोल़ूआँ दी रगड़ाई करा दा |
                                    .. मनोज मैहता

Friday, 28 October 2016

नगरोटा विकास गाथा

1998  यकीनन  ही सौभाग्यशाली वर्ष था
पुरानी  वर्जनायें  टूटने का सभी को हर्ष था
नगरोटा के मुख  पर  अनूठी कांति आई थी
बाली के रूप में  महानत्तम क्रांति आई  थी
तत्पश्चात तेज गति से  क्षेत्र में हुआ विकास
नगरोटा के अंधियारों  में  फैला तीव्र प्रकाश
पहली ही पारी में  बाली ने इरादे स्पष्ट किये
दुश्मनों के मंसूबे  कठिनश्रम से ध्वस्त किये
विगत सारे सालों का क्षोभ खेद मिटा डाला
चँगर और पलम का संपूर्ण भेद मिटा डाला
2003 नें तो सब कुछ  ही ख़ास बना डाला
62 प्रतिशत मत देकर इतिहास  बना डाला
आभा तब  और बढ़ी  जब मन्त्री बने  बाली
नगरोटा की धमक दिल्ली तक पहुंचा डाली
अपनी कार्य शैली से  ऊँचा झंडा गाढ़ दिया
घाटे वाले निगमों को  संकट से  उबार दिया
नगरोटा के विकास में  भर  भर  लाये थैली
टाँडा- हॉस्पीटल की ख्याति चहुँ और फैली
कई जुगों से बाधित कार्यों को करवा डाला
इलाके में सरकारी कॉलेज भी बनवा डाला
मगर अभी तो करना था पूरा रुत्वा हासिल
इस ही क्रम में नगरोटा में बनीं नई तहसील
2007 के चुनाव तो कांग्रेसियों को मार गये
आस पास के  सभी दिग्गज बाज़ी हार गये
मगर नगरोटा ने बाली पर ही विश्वास किया
उसी को चुना जिसने उनका विकास किया
विपक्ष में बैठ कर  भी  रास्ते पर अडिग रहे
राजनैतिक उत्पीड़न पे भी बाली सजग रहे
सारे हिमाचल में फिर ख़ुद की धूम मचा दी
रोजगार संघर्ष यात्रा कोने कोने में पहुंचा दी
हाई कमान ने भी तो पूरी पूरी तरफदारी की
घोषणापत्र लिखने की उनको जिम्मेदारी दी
2012 मे नगरोटा को  कुरूक्षेत्र  बना डाला
दिग्गजों नें तन मन धन पानी सा बहा डाला
पर सभी षडयंत्रकारियों का सूर्य अस्त हुआ
उनका करिंदा भी बाली के आगे पस्त  हुआ
तमाम अटकलों अफवाहों को झुठला डाला
रिपुओं के मुखों को शांति से कुम्हला  डाला
राजनैतिक वरिष्ठता मे झट से ऊपर उठ गये
जले तो बड़े विरोधी  अंदर ही अंदर घुट गये
ट्रांस्पोर्ट, तकनीकी शिक्षा साथ और आपूर्ति
तीनों ही महकमों में उत्पन्न करदी नई स्फूर्ति
परिवहन के बेड़े में अलग सी नई बसें डालीं
क्षेत्र में इंजिनीयरिंग कॉलेज भी लाये 'बाली'
मस्सल में सुंदर भवनों का निर्माण करवाया
विकास की हवा नही पूरा ही तुफान चलाया
नगरोटा ने सत्य में बुलंदी का आकाश छुआ
मिनी  सचिवालय का भी शिलान्यास  हुआ

Wednesday, 26 October 2016

बोलता तेरा काम है... !! !!

यूँ ही नहीं तेरा हर इक जुबाँ पर नाम है,
तू तो चुप रहता पर बोलता तेरा काम है|

तेरे साथी तो फरमाते हैं चैन-ओ-आराम,
सामने तेरे मगर ये अल्फ़ाज़ ही हराम हैं|

स्वाद में कड़वा सही असर मीठा है बड़ा,
या ख़ुदा किस नायाब मदिरा का जाम है|

किसीको ख़ुश करने को देते जो गालियाँ,
मन-ओ-मगज से तुझको करते सलाम हैं|

तेज़ी से डरा है या अँदाज़ से जल मरा है,
बस क़ातिलना तेरा यह तर्ज़-ए-ख़िराम है|

                                   .. मनोज मैहता

किस्माँ.. .. !! !!

घ़िरथ बाहती चाह़ंग गलांगे

दस्सा पूरा पता किंह़िंया लाँग्गे

ओआ गप्पां- गप्पां सिखिये 

सारियां ह़ी जे किस्मां लिखिये

घ़रघ़याल़ू, टौपू,छौरे,द्रँगाल़, 

साकड़े, दबकू,चीमड़े घंडवाल़

पखलू, लीले, गाह़ले, घटवाल़, 

 मल़ाँच, बड़जात्ये, पत्रवाल़

बणचर, लाकड़िये, पटियाले़ , 

लौदरी,बराड़,भ़ाटे ता कजले़

 खट्टे, जगोतरे, मुंगरे, सैह़रिये ,

 नन्दे, चुपड़े, डब्बे, भनायरिये

चँघड़, तौसे, जौहड़, भड़वार,

 कलमाड़ी, मारकर,  मोर मार

 मुरैणे, समौऊ, फनार, नल़ौऊ, 

 डींग,जमनियाल़ कनें घड़ऊँ

न्ह़्ल़ेटु, बगोतरे, पाँजले, क्रोंक, 

बाह़्ड़ी, धनोटिये,बैद,भ़ल़ौंच

 अँगारिये, दल़वाँच, शँडियाल़ 

बगूड़े, ध़्रोंच, मींड्डे, कठियाल़

 
फ़रेटू,स्याल़,चीमड़े,मनियाल़ू 

रैंगणियें,मड़दांण तां नरियाल़ू

 भ़ूत, नाग, बलाह़रू, डगयाल़ू

 फिड्डु, कैंदल़ कने बगियाल़ू

 
कोई खपरु कोई जोखणूं रौड़ू  

साकी,चड़ेलू, राख्खे, खोड़ू

 
चीमड़े, रैंसू, मसँद, मनियाल़ू,  

दलबाड़च, कुड़याल़े, सराल़ू

हल्ली भी छुटी गये मते यारो 

इत्णेयां ने ह़ी तुसां कम सारो

याद जे ह़ोर तुसां जो ओंग्गे

 तां मैह़ते जो रिंग इक मारो 

Sunday, 23 October 2016

ओ नौजवानों... !! !!

ह़िमाचले देयो नौजवानों कुस बख्खे तुसाँ खिट लगाईयो
दारुआ दियाँ तां गप्पाँ ह़ी छड्डा चप्पें चप्पें भँग्ग पुजाईयो

पूल कनें स्नूकर बस बह़ानें, चुणी लेयो मेयो नोयें ठकाणें
सारा ह़ाल ध़ुँएं ने भ़रोया समैका दी जिंह़ियां ध़ूणीं पाईयो

बेसबॉला दे बैटाँ फसाई सौए दिया स्पीडा बाईकाँ दौड़ाई
सौ ग्राम मास नीं चुतड़ाँ च, बेह़ली कजो बदमासी पाईयो

ह़ाँखीं दे तां कलोडु चढ़यो खाड्डु चमड़िया अँदर बड़यो
ह़ैगरे लगदी कमीज टंगोईयो जल़ी जीन ए़ कुथु फसाईयो

माऊँ बब्बाँ पासे तां दिख्खा कजो बणा दे खोटा सिक्का
खून परसीने दी गाढ़ी कमाई, कजो नशयाँ बिच उड़ाईयो

पागलाँ जो जेह़ड़ी दवाई लाँदे, तिन्हाँ कैप्सूलाँ तुसाँ खाँदे
तुह़ाड़ेयाँ पुठ्ठे कम्माँ जो दिख्खी, देवभ़ूमि बड़ी शरमाईयो

मोटरसैक्लाँ लोआह़ी दै दे या फँदयाँ गल़ेयाँ च लाई लै दे
जींदे जी असाँ मरी चल्ले ऐसी कजो तुसाँ अग्ग लगाईयो

                                                       ..मनोज मैहता

Friday, 21 October 2016

कजो पाया तैं मैह़ता नोट्टाँ दा खलार ह़ै... !!

ठँडी ठँडी बझ़ौणा लग्गी पाणियें दी ध़ार ह़ै
सीह़म बगया नक्के ते कनें चढ़या बुखार है

मत करा बेह़ली चिंता सब ठीक ह़ोई जाणां
ह़ै नीं एह़ बमारी कोई बस मौसमें दी मार ह़ै

कजो नेताजी दे गोड्डे तुसाँ जिकादे भ़ाऊओ
इन्ह़ांदे अपणें मुँड्डे पर लटकोईयो तलवार ह़ै

किंह़ियाँ कि पंछैणनें ह़ुण जागत ताँ बिट्टियाँ
मुछ्छाँ भ़ी रख्खियाँ कनें लाईयो सलवार है

ताजे समाचार कैस बिच पढ़िये या दिख्खिए
नँग्गिंयां बस फोटुआँ ने भरोईयो अखबार  है

बगानियाँ लाड़ियाँ जो कजो टूरी टूरी दिखदा
कद्दई छैल़ मोआ तेरिया जणासा दी नुह़ार है

दूंह़ं त्रीं फुल्कुआँ खाई रज्जी जे जाँदा ढिड्डड़ू
कजो पाया तैं मैह़ता एड्डा, नोट्टाँ दा खलार ह़ै

Thursday, 13 October 2016

'जियो' तुम जियो.... !! !!

रिलायंस की जियो सिम ने यारो धूम मचा दी है
एयरटैल व बाकियों की सच ही नींद उड़ा दी है
नैट फ्री देकर मक्खियां मारने पर मजबूर किया
बहुत लूटने वालों का हर इक सपना चूर किया
मुँहमाँगे दामों पर नैट की जी.बी. बेचा करते थे
कॉल टाईम,पावर जाने क्या क्या चेपा करते थे
जबसे आ गई है जियो भ्रामक प्रचार चलाया है
बड़ी हानिकारक है ऐसा हल्ला कुछ फैलाया है
ऑरेंज हो या फिर ब्लयू हम को तो बस लेनी है
और दिल से दुआएँ  मुकेश अम्बानी को देनी हैं
बिजनेस टैक्टिक्स प्रिय आप भी इस्तेमाल करो
तीन महीने ही सही  पब्लिक को खुशहाल करो
एक गुज़ारिश परन्तु हमने रिलायंस से करनी है
फॉरमेल्टीज़ ढेर सारी क्या तनिक कम करनी हैं ?
                                          .. मनोज मैहता

Tuesday, 11 October 2016

चाहतों के पर भी कटा डाले

मुहब्बत और उल्फ़त के वरके ही मिटा डाले
हमने तो अपनी चाहतों के पर भी कटा डाले

काँटे जो बिखरे पड़े थे तेरी राहों में बे हिसाब
दामन मे समेट कर मैंने, लो वो सब हटा डाले

हरिक बात मेरी पर तुम  जिन्हें बुड़बुड़ाती हो
किसने तुम्हें फ़ुसला कर ये गँदे हर्फ़ रटा डाले

अश्शाक नामुराद भला  कहाँ मानेगे मेरी बात
कि हसीनाओं नें शाहों से भी तलवे चटा डाले

छोड़ दीजे कुरेदना  अब तो उसके ज़ख़्माें को
'मैहता' ने सभी ग़म ख़ुद के सीने से सटा डाले
                                         .. मनोज मैहता

फकोया लकड़ू घ़रे यो ल्योणां ,
बोल्लया चोर नी कद्धी ओणां |

तोप्पा दे लोक्काँ बिच पाप्पाँ ,
अपणा मैल कुनीं मेयो ध़ोणां |

बाह़रके राबणे फूकणां लगयो ,
अन्दरे आल़ा  कुत्थु  फकोणा |

बगाने दी लाड़ी  सीता लगदी ,
अपणी ताड़का लगी बझ़ोणा |

राम जी डोल ह़ी  दड़ी रेह़न्यों ,
लछ्मणें अज घुट लाई ओणां |

थौह़ें जानयों तुसां भ़ीड़ा बिच ,
नह़ीं तां बटुआ गोआई औणां ,

बड़ा मत फणसोयें बो राम्मां ,
जानकिया नक बढाई औणां ||
                     ..मनोज मैहता

Saturday, 8 October 2016

खर्चे आल़ा म्ह़ीना...!!

छल्लियाँ दे ता रही गै गुल्लु पर ध़ान ह़ुण पकणां लग्गे
श्राद्धाँ ते मसे जे गै छुड़की नवरातरे मुँड्डे कढणां लग्गे
मौसम भी बदलोंदा आया, रती रती ठंड लगी बझ़ोणां
रात्तीं किछ लम्मियाँ ह़ोईयाँ ध़्याड़े दिख्खा घटणां लग्गे
गाँधी जयँती मसें म्या बीती ठेकेदारें दारू मँह़गी दित्ती
माईके दी वाज सुणींने सब रामलीला जो ऩठणां लग्गे
नारद मोह़ ते पृथ्वी पुकार खब नीं कैस गलाँदे बो यार
स्टेज सैक्ट्री माईके फकड़ी जोरें नें किच्छ पढ़ना लग्गे
ध़ान्नां दी जाह़लु चली कटाई, जणासाँ मर्दाँ गई थकाई
खाली बैठ्ठयों मीटे वाल़े, भ़ार कुक्कड़ाँ दे बध़णां लग्गे
गाह़्ंणी दा कम्म जे पोणां,  बजार  फिरी ते मँदा ह़ोणा
फिलह़ाल तां फैणियां अाले़ आट्टा पैरां ने मथणा लग्गे
बंग्गाँ, पराँदू, छक्कु सीसे खाली ह़ोणें सबनीं दे खीस्से
करवाचौथ जे आया नेड़े जणासां दे भ़ाअ बध़णा लग्गे
अपण ह़ल्ली रती कि ठह़रा, पह़लैं ओणां मेयो दसह़रा
अक्तूबर मह़ीना उंह़िंयाँ  ठँडा, मुँह़ मर्दां दे भ़खणा लग्गे
तीह़ां तरीकाँ आई दयाल़ी, जेबाँ उध़डियाँ ह़ोयो खाली
ड्राई- फ्रूट कनें मठयाईयाँ, बुरे ह़ाखीँ मेयो लगणा लग्गे

                                                     .. मनोज मैहता

Thursday, 6 October 2016

गद्दी छैल़ तां गद्दण सोह़णी
ह़त्थे लाँदयाँ ह़ी मैली ह़ोणी
लौह़णां लग्गे पह़ाड़ाँ जोत्तां
ह़ुण गद्ध़ेरने  बर्फ जे पोणी
बुन्ह़ं औंदयाँ ह़ी मेल़े  लगणेंँ
बूचरां ह़रिक, छेल्ली टोह़णी
मीट, नरासे, मुँड्डी तां टुंड्डियां
मेस्से दी लग्ग, कीमत पोणी
भ़ेड़ तां भ़ेड्डू डगणा भ़ी पोणे
तां जाई मितरो, उन्न कतोणी
लबा लब भ़रोयो ह़न्ड्डू  पारू
कुथु रखणा, ह़ुण दुध़- नौणी
दसह़रा तनीं दिखणां मिलना
अपण दयाल़ी, बुन्ह़ं  मनोणी
                   ..मनोज मैहता

वाह बो गद्दणी

गद्दी छैल़ तां गद्दण सोह़णी 
ह़त्थे लाँदयाँ ह़ी मैली ह़ोणी

लौह़णां लगे पह़ाड़ाँ जोत्तां 
ह़ुण गद्ध़ेरने बर्फ जे पोणी 

बुन्ह़ औंदयाँ ह़ी मेल़े लगणेंँ 
बूचरां ह़रिक छेल्ली टोह़णी 

मीट, नरासे,मुँड्डी तां टुंड्डियां 
मेस्से दी लग्ग कीमत पोणी

 भ़ेड्डाँ भ़ेड्डू  बो डगणा पोणे
 तां जाई मित्रो उन्न कतोणी 

लबालब भ़रोयो ह़न्ड्डू पारू 
कुथु रखणा ह़ुण दुध़- नौणी

दसह़रा नीं दिखणां मिलना 
अपण दयाल़ी बुन्ह़ं मनोणी

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...