सब चीज आती है हमें पर बेवफ़ाई नही आती
हर बात दिल की पर ज़ुबाँ पर लाई नही जाती
तेरी ज़फा का ज़िक्र ख़ुद बता किससे करें हम
हमसे ऐसी आग-ओ-हवा भड़काई नही जाती
रिश्ते की इस नाज़ुक डोर को उलझने ना देना
फिर ता उम्र ऐसी सिलवटें सुलझाई नही जाती
माना कि हसीन दौर में दाखिल तुम हो गये हो
पर अतीत के सायों से जान छुड़ाई नही जाती
वक्त के साथ कुछ यादें धुंधला सी तो जाती हैं
खरौंचें जिगर की सारी मगर मिटाईं नही जाती
कहने को यों तो 'मनोज' तू बनता है बड़ बोला
पते की बात तुझ से कोई पर बताई नही जाती
यह इश्कबाज़ी ख़ुद कम्बख्त सीखनी है पड़ती
मदरसे में तो यह तालीम सिखलाई नही जाती
.. मनोज मैहता
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