Saturday, 9 September 2017

Forgetting own customs


अपणेँ रिवाजाँ दिंयाँ अप्पु देणां लग्गे बल़ियाँ
गणेश पूजा सुरु करी, भुलाई छड्डियाँ रल़ियाँ

झ़ोलए़ू चुक्की लाई खिट, लयोणे तांईं सब्जी
खुखनुएं तां फुलणुएँ नें भ़रोईयाँ सब थल़ियाँ

माक, त्रपखी, ख्या बरखड़ी कख पता ह़ैईनी
नमन्त्रणा चवर्खां च, मनाेआ दियां रंगरल़ियाँ

छड्डी नें रिह़ाल़िया रखोणा लग्गा करवा चौथ
नोईयाँ मेमां अरो दरअसल गूगला नें पल़ियाँ

टेरियाँ छोरूआँ गल्लाँ, मीटाँ तां सराबा दियाँ
मां की सिरी मरान, अग्गीं सल़ाँ दियां वल़ियाँ

अद्धा ह़ी फकोया ह़ल्ली, इसजो ह़ी खाई जा
माखन्त इत्थु भी तोपा दे सींखाँ कनें डल़ियाँ

इन्हाँ दी जाणें खड, क्या ध़ूढ़ा- क्या त्रयांबल़ू
क्युंआं जो समझ़ी जाहन मटरे दियां फल़ियाँ

Wednesday, 21 June 2017

I really repent... !!

This is incident of 1986.I was studying my 11th class in Govt. College Dharamshala and used to travel in State Corporation bus on student concessional pass. There are two different routes from my native place Nagrota to Dharamshala but I always preferred to go via Kangra in Arth-Nagri -Kangra-Dharamsha routed bus. Usually govt employees were the co passangers. But that day one smart middle aged gentleman got into the bus and shared the seat beside me. As vehicle reached the Education Board toll tax stop I got up to climb down, "where is sainik board office ", the gentleman asked in rough heavy tone. You have to get down here only I said with a smile and in a polite voice. The gentleman almost pushed me and rushed towards the door as if he had to extinguish some fire. I was little shocked by his weird behavior but nodded my head to cool down and forget that strange creature. I too got down after allowing group of girl students first. Bus moved in first gear spreading lot of smoke with a peculiar smell which I liked to smell and inhale. As I started to move my eyes found a purse lying on the road. I looked here and there and found nobody noticing me so I picked the purse and put it in my side pocket. My heart started beating fastly. By nature I was never greedy and dishonest but that expensive looking wallet had induced these properties in me. I kept walking fast and silently till I reached college road. After careful gaze in all directions I took out the purse from my pocket and examined it properly. Brand new blue notes which amounted approximately five thousand rupees made me crazy as I got fifty rupees pocket money per month from my school teacher father. For few minutes I dreamt of utilizing these rupees for purchasing English willow bat and cricket kit which was my biggest hobby. Then I thought whose wallet this could be. The man can be single earning member of a family like my father, thinking so I examined the purse again and found the passport size photograph of the same gentleman who had pushed me back to get down the bus. I again moved back and went into the Sainik board building and saw the man sitting on the chair busy reading the news paper. Uncle, found your purse on the road , I said to him. The man at once got up from the seat and grabbed the purse from my hand staring at me with burning eyes as if I had stolen it. After examining and counting his rupees he put the purse in his back pocket said to me, why don't you leave now. OK I murmured and came back cursing that wicked man who in spite of thanking me uttered insulting words. I still repent my decision of returning that wallet to such a ruthless and nonsense man.

Monday, 12 June 2017

घर नहीं है...!!

नाज़--नख़रे उठाने की उम्र नहीं है ,
तिरे हुस्न में भी अब वो असर नहीं है

तय ही तो था कि टूटेगा बे मेल रिश्ता ,
मेरी ओर से भी अब के कसर नहीं है

ख़्वाब--ख़्यालों में कब तक खोयें ,
यों कर तो ज़िंदगी होनी बसर नहीं है

बेजारी का चढता यह आजार हर दिन ,
कि ग़म--इश्क़ से बढ़के ज्वर नहीं है

पूछते फिर रहे हो क्यों पता- ठिकाना ,
मुझ कम्बख्त का कहीं भी घर नहीं है

 .....मनोज मेहता.....

पानी...!!

पानी...!!

चश्मों में लो इक बार फिर से भर गया पानी
नज़र--शक से देखना, मुझे कर गया पानी

वैसे तो बग़ैर इस के यक़ीनन जीना मुहाल है 
उसको पूछो जिसके सर तक भर गया पानी 

बेरंग तो उनको है बिलकुल नापसंद याखुदा
हुआ लाल तो रिंदों को, मस्त कर गया पानी 

जब कभी भी हुआ, यकायक दीदार--यार 
कर बदन को बेतहाशा, तर--तर गया पानी 

चंद कोंपलें निकली तो थीं बाग़--वीरान में 
कल रात उनके ऊपर से ही गुज़र गया पानी 

अँबर का मन भी था के निकाल फैंके बाहर 
तुफान-अो-बिजलियों से पर डर गया पानी 

....मनोज मेहता...

Saturday, 3 June 2017

बाल़द (बैल)

भ़ुये खाई नें सुक्के बाल़द
आये ट्रेक्टर  मुक्के बाल़द

मुँह़्ह़ाँ छिक्के दित्ते बह़न्नीं
दिन भ़र रह़ै भ़ुख्खे बाल़द

ह़ल़ां- ज़ुँगलेयां दे  भा़राँ नें
दिख्खा कैसे सुक्के बाल़द

सजाई चित्री  बणाये नन्दी
बंड्डंन पुच्छाँ रुक्के  बाल़द

खुंड्डाँ पुट्टी जाह़लु जे न्ह़ठ्ठे
छलैड़े च भ़ी लुक्के बाल़द

मरने परँत भ़ी कम्में  आये
बणें बैल्टां कनें जुट्टे बाल़द

खल्लाँ पेड़ी करी नंगे कित्ते
टोक्के नें करी टुक्के बाल़द

खाद्दे कुत्तयाँ, गिदड़ाँ इल्णीं
माह्णुएं जे नीं चुक्के  बाल़द
                .. मनोज मैहता

Monday, 29 May 2017

बारात की तरह... !!

किसी में वो बात नहीं तेरी बात की तरह ,
हस्ती कहाँ से पाली तिलिस्मात की तरह |

दोनों में ही मुकद्दर वाली लीक है ग़ायब ,
तेरा हाथ भी हूबहू है, मेरे हाथ की तरह |

चेहरे पर शैवाल और काई सी जम गई ,
आँखें बरसी बेमौसमी बरसात की तरह |

लोग ठहाके लगाते चले हैं इस के साथ ,
जनाज़ा मिरा लगता है बारात की तरह |

जितना सुलझाया उतना ही उलझ गया ,
इश्क़ बना काश्मीर के हालात की तरह |

लहज़े में तिरे फलस्फ़े की बू है आ रही ,
'मनोज' तू बन रहा है सुकुरात की तरह ||
...मनोज मैहता..

Monday, 15 May 2017

बुज्झा भ़ला जरा तिद्दा नाम ..!!

खुआ तिसा जो सुँड- बदाम
मीनकिया जो ह़ोया जखाम

साह़की बुड़कां मारी जा दा
इक नसेड़ी भ़ंगड़ पह़्लवाण

पट्ट तां पिल्लियाँ इक बरौबर
समझें अप्पु जो बड्डा  साह़न

मण-मण पक्कियाँ ठूसाँ मारे
नल़ुआँ बिच ह़ै  रति नी जान

सब ह़ी तां  समझी गयै ह़ोणे
बुज्झ़ा भ़ला जरा तिद्दा नाम...

Thursday, 11 May 2017

अलविदा !!

अब जबकि वो जज़्वा ही नही तो क्यों आरजू-ए-वसल करें
भूल कर हुस्न-ओ-शवाब, नज़र तुमको आखिरी ग़ज़ल करें

भिगो कर इस नामुराद- मनहूस चेहरे को सैल-ए-सरिश्क में
हल्का हो जाए गुबार-ए-जिगर पुरशिश कोशिश असल करें

चंद कोंपलें निकली थीं, बारिश- ए- इश्क़ से बंजर जमीन में
दिली ख्वाहिश है आज, सुपर्द- ए- आतिश सारी फसल करें

ये तसब्बुर जेहन को फिर बारहा, रहता है करता  खाज़िल
अपनी आग-ए-खुन्नस में तबाह क्यूं कर हम नई नसल करें

Saturday, 22 April 2017

क्या नाम दूँ...!!

करीब आते ही उसे जो आती, उबकाई को क्या नाम दूँ
तू ही बता दे ओ दिल-ए-नादाँ,  हरजाई को क्या नाम दूँ

पास-पास रह कर भी हम दोनों यूं लगता है मीलों दूर हैं
मिलन की रुत में हाल है ये,  तब ज़ुदाई को क्या नाम दूँ

खुशी में भी अंदाज़-ए-गुप्तुगू नें दिल में नश्तर चुभो दिये
लम्हा-ए-ख़ुन्नस में छाई तुम पर,  रुस्वाई को क्या नाम दूँ

मातम की ही धुन निकले, यकीन है नुक्स-ए-नफ़स नहीं
कशमकश में हूँ बड़ा मैं कि इस शहनाई को क्या नाम दूँ

अक्स मेरा तो जानता हूँ रहेगा लिपटा हुआ मेरे ही साथ
उभरती है जो उसके संग दूजी, परछाई को क्या नाम दूँ

जलन-सड़न की है मुश्क फैली वादी-ए-सबा में जोरदार
मेरा दिल है सही-सलामत, फिर पुरबाई को क्या नाम दूँ
.. मनोज मैहता

Monday, 10 April 2017

एहतराम है..!!

मेरी वफ़ादारियों का क्या यह ही ईनाम है
तेरी जुबाँ पे फ़कत मेरे दुश्मन का नाम है

सबकुछ करके भी मैं रहा नापाक काफ़िर
वो बिन नमाज़ पढ़े भी तेरा शाही इमाम है

इक बार तो सभी मुरीदों के दिल टटोल ले
उस ही से तो उन सबको शिकवे तमाम हैं

मुझसा नहीं मिलेगा मान जा मेरी भी बात
यूँ लाखों के हुज़ूम का तेरे पास इंतज़ाम है

मैं तेरा शागिर्द हूँ इस बात का है फ़ख्र मुझे
रब्ब से ज़्यादा तेरे लिये मन में एहतराम है
                                     ..मनोज मैहता

Friday, 7 April 2017

अदालतों से पूछिये .. !!

बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये

हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो नहीं हरगिज़
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये

इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगनित दौर देखे हैं
मुझ पे अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये

ये कायदे कानून दुनिया के हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेकती  उन ताक़तों से पूछिये
                                                    
कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ  फुटपाथों पर नँगे सो रहे
मदमस्त अध-नंगों की  महफिलों या दावतों से पूछिये
                                                     ..मनोज मैहता

Wednesday, 29 March 2017

अदालतों से पूछिये..!!

बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये

हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो हरगिज़ नहीं
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये

इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगिनत दौर देखे हैं
मुझ पर अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये

ये कायदे- कानून दुनिया के, हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेक देती उन ताक़तों से पूछिये

कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ फुटपाथों पे ही नँगे सो रहे
मदमस्ती में अधनंगों की महफिलों या दावतों से पूछिये
                                                       ..मनोज मैहता

Thursday, 23 March 2017

लिखता चला गया... !!

लिखने का शौक था लिखता चला गया
बाज़ार-ए-ज़िन्दगी में बिकता चला गया

तराशा ना गया चूँकि था नींव का पत्थर
सारा महल मुझी पर, टिकता चला गया

एक अरसा बाद मैंनें  जब उतारी  ऐनकें
बहुत दूर तलक साफ दिखता चला गया

तोड़नें की मैंनें यूँ तो बहुतेरी की कोशिशें
मेरा तेरा रिश्ता लेकिन निभता चला गया

दौलत ज्यों ज्यों बढ़ी जेब-ओ-तिज़ोरी में
चैन-ओ- करार त्यूँ त्यूँ, छिनता चला गया

बुत था वो इक फ़कत ख़ुदा की शक्ल में
पागल मनोज उसी पर मिटता चला गया
                                  .. मनोज मैहता

Monday, 13 March 2017

ठिकाना कर.... !!

ग़मों में डूब जाने का न ऐ दिल कोई बहाना कर
तामीर हसरतों की ख़ातिर नया ही ठिकाना कर

बंदूक पास है माना तेरे  महज़ इस से नहीं होगा
जंग जीतनी है ग़र तूने  तब तय तो निशाना कर

कुदरती करिश्में से अब  है नहीं ये बदलने वाला
अपनें शेरों की मस्ती से  मौसम आशिक़ाना कर

यहाँ मुर्दानगी मरघट से भी  छाई हैं क्यों ज़्यादा
अपनीं दास्ताँ कहकर ये महफ़िल शायराना कर

तानाकशी रोज की तुम्हें ही  मार दे उससे पहले
ऊँची आवाज़ से तेरी वार तू भी क़ातिलाना कर

इरादे बुलंद हैं जो तेरे फिर किस बात का डर रे
मज़बूत हस्ती से अपनी कायल तो ज़माना कर

अम्र तेरी सालों से नहीं बल्कि दीदों से तय होगी
सदियों तक न जो भूले  ऐसा करतब स्याना कर

बहक रहें हैं रिंद 'मनोज' मयख़ाना दैर दिखता है
तोड़ेंगे जाम बुत समझके  बंद पीना पिलाना कर
                                            .. मनोज मैहता

Friday, 10 March 2017

मन खिली गया

दोपह़राँ ह़ुंदिया ह़ुंदिया तिकर दिल मेरा खिली गया
बड़ियाँ ना नुकरां बाद बेरोजगारी भ़त्ता मिली गया

Wednesday, 8 March 2017

मुँह पर मुस्कुराने की

पुरज़ोर कोशिश करता हूँ गले उसको लगाने की
अदा उसकी है भी क़ातिल मुँह पर मुस्कुराने की

चल अब छोड़ हसीं अग़्यार तुझ से ये नहीं होगा
ताक़त और पैदा कर तब हसरत कर मिटाने की

मैं तो हूँ ही पाक दिल जो हो सब कह ही देता हूँ
थोड़ी और कर वर्जिश जो मँशा है आज़माने की

जो करना है वो करता रह पर यह बात तो है तय
तेरी हरेक ओछी हरकत पर निगाहें हैं जमाने की

खुले हैं दर-ओ-दरवाजे  मज़े से भेदिये भिजवा दे
मेरे पास तो हर ख़बर है  तेरे खुफ़िया ठिकाने की

मैं गुलाम-ए-आवाम हूँ  पर हूँ आँखों का तारा भी
चल अब छोड़ दे आदत मुझसे जलने जलानें की
                                             .. मनोज मैहता

मुँह पर मुस्कुराने की

पुरज़ोर कोशिश करता हूँ गले उसको लगाने की अदा उसकी है भी क़ातिल मुँह पर मुस्कुराने की चल अब छोड़ हसीं अग़्यार तुझ से ये नहीं होगा ताक़त और पैदा कर तब हसरत कर मिटाने की मैं तो हूँ ही पाक दिल जो हो सब कह ही देता हूँ थोड़ी और कर वर्जिश जो मँशा है आज़माने की जो करना है वो करता रह पर यह बात तो है तय तेरी हरेक ओछी हरकत पर निगाहें हैं जमाने की खुले हैं दर-ओ-दरवाजे मज़े से भेदिये भिजवा दे मेरे पास तो हर ख़बर है तेरे खुफ़िया ठिकाने की मैं गुलाम-ए-आवाम हूँ पर हूँ आँखों का तारा भी चल अब छोड़ दे आदत मुझसे जलने जलानें की

Sunday, 26 February 2017

मैंनें लगातार प्रयास किया है कि मैं हिमाचल प्रदेश के बेरोजगारों के लिये कुछ कर सकूं| राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी ने मुझे गत चुनावों की घोषणा पत्र समिति का संयोजक बनाया| मैंनें उसी समय बेरोजगारों के लिये बेरोजगारी भत्ता देकर उनकी माली हालत को ठीक करने जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से घोषणा पत्र में रखा| उसके बाद बेरोजगारों की समस्याओं को सही ढंग से जानने के लिये 2012 में रोजगार संघर्ष यात्रा के तहत उनसे जगह जगह जाकर मिला और उनकी पीड़ा को समझने का प्रयास पूरी ईमानदारी से किया जिसके फसस्वरूप बेरोजगार पूरे प्रदेश में एकजुट होकर कांग्रेस पार्टी को समर्थन देने के लिये लामबद्ध हुये, मैंनें उन्हें कांग्रेस पार्टी के समर्थन में इकट्ठा करने का सफल प्रयास किया जिसके कारण प्रदेश में माननीय श्री वीरभद्र सिंह जी के नेतृत्व में श्रीमति सोनिया गांधी जी के आशीर्वाद से 25 दिसम्बर 2012 को हमारी सरकार सत्तारूढ़ हुई | मुझे श्रीमति सोनिया गांधी जी के आशीर्वाद से प्रदेश सरकार में खाद्य आपूर्ति,परिवहन एवम् तकनीकी शिक्षा मंत्री का प्रभार मिला| तकनीकी शिक्षा में इंडस्ट्रियल स्किल का महत्वपूर्ण विभाग भी मिला | मैंनें मंत्री पद ग्रहण करने के पश्चात अधिकारियों की पहली बैठक में ही ऐसी योजनायें तैयार करने की पहल पर जोर दिया जो रोजगारोन्मुखी हों ताकि बेराेजगारों को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें | तकनीकी विश्वविद्यालय को अतिरिक्त संसाधन मुहैया करवाकर अधिक सक्षम व प्रभावशाली बनवाया तथा वहाँ उपकुलपति की नियुक्ति प्राथमिकता के आधार पर करवाई ताकि नई योजनाओं व नीतियों द्वारा हमारे पात्र नौजवानों को रोजगार के अवसर मिल सकें | हमनें परिवहन विभाग को अधिक कार्यशील बनानें के लिये सैंकड़ों चालको को भर्ती किया तथा साथ ही साथ कंडक्टर भर्ती पूरी औपचारिकताओं के साथ करवाई और आप जानते हैं कि किन कारणों से यह भर्ती माननीय न्यायालय में विचाराधीन है | इसी दौरान एच आर टी सी निदेशक मंडल ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुये तय किया कि कौशल प्रबन्धन के अन्तर्गत ड्राईवर, कंडक्टर व टी एम पी ए को प्रशिक्षण दिया जाए | इसमें "हुनर से हक़" तक बेरोजगारों को तैयार करना था मगर इस पर भी कुछ लोगों को शँका थी कि काँगड़ा के बहुत सारे अभ्यार्थियों नें प्रदेश के कई स्थानों पर आवेदन कर रखा है और यह योजना महज़ उन्हीं को लाभान्वित करने के लिये ही है, मैनें विधान सभा व अन्य माध्यमों से हिमाचल की जनता को यह विश्वास दिलवाया कि लगभग 8500 अभ्यार्थी जिन्होंनें आवेदन किया है क्रमवार सभी को उपरोक्त प्रशिक्षण दिया जायेगा और यह मैंनें पूरी निष्पक्षता से करवा भी दिया अब इसी योजना के तहत पूरे प्रदेश में अगले बैच भी प्रशिक्षित हो रहे हैं| आप जानते हैं कि किन लोगों नें बेवज़ह इस प्रशिकक्षण का बिरोध किया ! मगर हमारे कुछ चुने हुए साथियों ने इसे अाधार बना कर पत्र लिखा और बिना समझे इसका विरोध किया और माननीय हाईकोर्ट मे केस निरस्त होने के बावजूद इसे प्रशासनिक ट्रिब्युनल में ले जाकर पात्र नौजवानों को उनके हक़ों से महरूम कर दिया| | जब अपनें भत्ते बढ़ाये जाने होते हैं तब तो निर्वाचित प्रतिनिधि मूक रहते हैं परंतु जब युवाओं को रोजगार की बात होती है तो उसे कानूनी प्रक्रिया में उलझाकर रख दिया जाता है यह बात मेरी समझ से परे है | मैं इन परिस्थितियों में बेरोजगारों का दुख समझता हूँ तथा वे भी मेरी व्यथा को भलीभांति जानते ही हैं | मैं हाथ जोड़कर सभी बेरोजगारों व उनके परिवारों से माफी मांगता हूँ जिनका भविष्य इस प्रक्रिया की भेंट चढ़ गया लेकिन आपको आशा दिलाता हूँ कि आपके साथ अन्याय नहीं होनें दूँग| मैं स्वयं 25 मार्च 2017.को आपसे मिलना चाहता हूँ | मैं आपको आशान्वित करता हूँ कि आगे भी मैं जिस भी स्थिति में होऊं बेरोजगारों की लड़ाई लड़ता ही रहूंगा | मैंनें आप सेयह भी कहना है कि बहुत ही लगन और मेहनत से जे .एन .आर.यू .एम की परियोजना प्रदेश में लाए जिसमें 800 नई बसें और 500 स्टार बसें1300 बसे लाई ताकि प्रदेश की जनता को अति उत्तम बस सुविधा उपलब्ध करबाई जा सके ,हर गांब में अच्छी सस्ती और सुरक्षित बस सेबा दी जा सके!मैंनें जब से प्रदेश सरकार में परिवहन विभाग संभाला,मुझे परिवहन विभाग घाटे और दयनीय हालत मैं मिला! मैने बहुत दुखी हालत में जनता से दो साल का समय मांगां!इसी समय में मैं हजारों बसें भी लाया और करोड़ों रूपये की सौगात भी लाया जिस में तकनीकी शिक्षा के तहत जिला सिरमौर मैं आई .आई.एम ,. जिला ऊना में आई.आई .टी आदिश शामिल हैं! लेकिन मुझे आज तक इस बात का दुख: है सैंकंडो बसें

Monday, 6 February 2017

हा हा हाहाहा हा हा ... !!

चाहे उसको बदनाम करो या फिर झूठे मुकद्दमे ठोको
रात दिन यही चिंता है बाली को किसी तरह भी रोको

करवा दी कितनी नादानी नहीं बनेगी दूसरी राजधानी
न कोई सचिव न निर्देशक झूठी ही तुम तालियाँ ठोको

मैंने पाल रखे हैं जो प्यादे उनके भी मुझसे ही हैं इरादे
कामकाज भाड़ में जाये बस आँखों में धूल को झोंको

कॉलेज लो उप- तहसीलें ले लो पर सुनो तुम मेरे चेलो
जो मुझको महाराज पुकारे उसकी बात कभी न टोको

कर दूँ तुम्हारे वारे न्यारे  झूठे ही सही लगाओ मेरे  नारे
मेरे चमचे तो एैश ही करेंगे तुम मरो हिमाचल के लोको

बँद होगी तुम्हारी ही दलाली अग़र सत्ता में आया बाली
उसका रास्ता रोकने को  मेरे साथ सारी ताकत  झोंको

                                                  ... मनोज मैहता

Friday, 3 February 2017

शख़्सियत को आपकी .. !!

शख्सियत को आपकी कर तार तार जाती है
इक तरफा मुहब्बत जीते जी ही मार जाती है

छोड़ो भी शौक ये, नवाबों की मानिद जीने के
मुकद्दरों से तमन्नायें तो हर सू ही हार जाती हैं

जँग से कुंद ये खंजर चमचमाता भी था कभी
वक्त के कहर से यूँ ही हर शै की धार जाती है

कभी मौका निकाल कर, मिल तो लिया करो
बढ़ती ही नहीं तो ताल्लुकात में दरार जाती है

ये फ़ाकाकशी की मार है याकि सफर की ऊब
मंज़िल के पास जा कर घटती रफ़्तार जाती है
                                          .. मनोज मैहता

Saturday, 21 January 2017

आँखों में .... !!

आँखों में रँगीन से साये उभर आये थे
मुद्दतों के बाद हम फिर उधर आये थे

तेरे दीदार नें फिर लो ख़राब कर दिये
हालात अपने यूँ काफी सुधर आये थे

इससे पहले कि यह ऊँची उड़ान लेता
हम नादान दिल के  पर कुतर आये थे

कहना तो चाहते थे हर बात सच सच
जानें क्योंं सरे महफ़िल मुकर आये थे

हमें देखकर हँसना उनका वाज़िब था
मफलर छोड़ ओढ़  तेरी चुनर आये थे
                              .. मनोज मैहता

Wednesday, 11 January 2017

कामयाब कर गये... !! !!

शौक हमें देकर क्याें  उनके चाव मर गये
जरा मुस्कुराये तो वो समझे घाव भर गये

सब जानते हैं कि  अपने एैबों में शुमार है
बिलकुल नहीं या फिर  बेहिसाब कर गये

महफ़िल मे सुना है  उन्हीं के होते थे चर्चे
हुनर हमारे पर उनको ला-जवाब कर गये

ये मतलब-परस्तियाँ  या कि सर-मस्तियाँ
ख़ाम्खाह ही अपना  वक्त ख़राब कर गये

शबनम के चँद कतरों का ऐसा चला फ़ुसूँ
सूखे पत्तों की नस नस को शराब कर गये

दुनिया के मयखाने में  कुछ रिंद ऐसे मिले
शरीफों की शराफत को बेनकाब कर गये

लेते रहे उम्र भर जो  तेरी वर्बादी के सपने
वही यार मनोज तुझको कामयाब कर गये
                                  .. मनोज मैहता

Tuesday, 10 January 2017

अजमेर शरीफ

मुईनुदीन चिश्ती की दरगाह
नहीं है जी यह कोई सैरगाह

यहाँ जमता है हर रोज़ मेला
रोज दीवाली है रोज ईदगाह

गरीबनवाज़ के दर पे सुकूँ है
ॐ भी है, है भी बिस्मिल्लाह

हरे लिबास में सोया जगा है
यहाँ पे फकीरों का शहँशाह

Monday, 9 January 2017

हम अकेले हो गये... !!

सफ़र-ए-इश्क़ में न जाने क्या झमेले हो गये
लीजिये इक बार फिर से हम अकेले हो गये

ऐसा नँगा रक़्स किया वाद-ए-सबा ने देखिये
आदमी के मकाँ बिखरकर लो तबेले हो गये

यों भी कम ही फ़र्क है  मर्द और घोड़ों में जी
हरी घास ज्यों दिखी  दोनों झट नवेले हो गये

टी.वी चैनलों में आ गये जब से बाबा रामदेव
मीट मुर्गे से दुगने मंहगे  लौकी- करेले हो गये

मान भी जाईये हुज़ूर  तन पर न करिये ग़ुरूर
आप से अरबों पहले भी मिट्टी के ढेले हो गये
                                        .. मनोज मैहता

Friday, 6 January 2017

छोड़ भी दो .. !!

छोड़ भी दे तू अब ग़िले-शिकवे ये वफ़ादारी के
हुनर उसने चुराये हैं  इस कदर ही अश्आरी के

तूने इश्क इबादत समझी उसने फ़कत तफरीह
तेरे और उसके मायने,  अलग हैं दुनियादारी के

इतनी भी गहरी उदासी, न फिर ले कर सीने में
बहुत नायाब सिले मिलेंगे उसको इस गद्दारी के

उसको करने दे मौज तू जाकर पास अग़्यारों के
तुझे भी तो मिलेंगे मौके उसकी ख़िदमतगारी के

पलक भी हुईं बोझिल दिल था पहले ही चोटिल
पसंद नहीं उसको मनोज, अँदाज़ तेरे खुद्दारी के !!

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...