मुईनुदीन चिश्ती की दरगाह
नहीं है जी यह कोई सैरगाह
यहाँ जमता है हर रोज़ मेला
रोज दीवाली है रोज ईदगाह
गरीबनवाज़ के दर पे सुकूँ है
ॐ भी है, है भी बिस्मिल्लाह
हरे लिबास में सोया जगा है
यहाँ पे फकीरों का शहँशाह
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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