Tuesday, 10 January 2017

अजमेर शरीफ

मुईनुदीन चिश्ती की दरगाह
नहीं है जी यह कोई सैरगाह

यहाँ जमता है हर रोज़ मेला
रोज दीवाली है रोज ईदगाह

गरीबनवाज़ के दर पे सुकूँ है
ॐ भी है, है भी बिस्मिल्लाह

हरे लिबास में सोया जगा है
यहाँ पे फकीरों का शहँशाह

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...