Wednesday, 29 June 2016

छडी देया!!

रोण- क्ल़त पाणें दी अड़यो, नीत जल़ी जाणीं छडी देया ,
भ़ोल़याँ जो बेह़ला जरकाणे दी, आदत पराणी छडी देया |

मन्नयां कि बड़ा सोह़णां सुर बख्सया तुह़ां जो उपरा आल़ें ,
मह़ी गाह़ं बीण बजाणें दी आदत खसमांखाणीं छडी देया |

सपरेटे दुध्धे नें ह़ुण करा गजारा, मरीजो मड़यो दिलाँ देयाे ,
भ़ुली नें स्कीनीं घ़्यो- मक्खणें दी, तुसां मध़ाणीं छडी देया |

कदी कदी ता तुसां दे बोल, लगन प्रबचन बाबेंयां-संत्तां दे ,
पर हर टॉपिके पर बाझ़ी मगजा, जीभ चलाणीं छडी देया |

एह़ कलियुग ह़ै मेरेयो मितरो, पुर्जयां कारखानेयां दा जुग ,
कुँजु-चँचलो, ससी पुन्नुयें दी, तुसां प्रेम कह़ाणी छड्डी देया |

एह़ नीं बोल्ला दा कोई कि दिखणें दा भी ह़ै मुल्ल लग्गदा ,
जेह़ड़ी कुह़सकी जो खुभ्भे, सैह़ गल्ल गलाणीं छडी देया |
.. मनोज मैहता...

Friday, 17 June 2016

न बहर पे जाईये...!!

न काफ़िये, न मिसरे न ही बहर पे जाईये ,
मेरे मतले के आक़िबत-ए-कहर पे जाईये |

उन्ह अख्ज़-ए-अग्यार से, मेरी है इल्तिज़ा ,
माशूका छीननीं है तो मिरे दहर पे जाईये |

अल्फ़ाज़ ही काफ़ी हैं, मेरे कत्ल के लिये ,
यार मेरे न यूँ ही, शीशी-ए-ज़हर पे जाईये |

आबे-चश्म के सैलाब में, मैं डूब जाऊँगा ,
मुर्दा जिस्म मेरा लेकर, न नहर पे जाईये |

इधर उधर पूछकर न वक्त ज़ाया कीजिये ,
मिलेगा खुद़ा वहाँ ही, अपने दर पे जाईये |

दौलत-ए-जहान, उसका दिल है मेरे लिये ,
भूखे ही मर जायेंगे, न मेरे ज़र पे जाईये ||
.. मनोज मैहता..

Sunday, 12 June 2016

अँदाज़ तेरा...!!

ध्यानमग्न से बैठे हो इसमें क्या कोई राज़ है,
वाकई अचंभित हो या महज़ इक अँदाज़ है?

बेचैनी को दिल की, लब कहने को हैं आतुर,
आँखें मगर बोल रहीं मन में जो अल्फ़ाज़ हैं|

हर सीनें में कोई ग़म, नासूर सा है फैल रहा,
असल में यह ज़ालिम ही, मर्ज़ का इलाज़ है|

हकीम बना जो बैठा है रोगे इश्क का माहिर ,
खुद इस बीमारी से हालत उसकी नासाज है |

बड़ा आगे बढ़ आये इस गफ़लत में न रहिये ,
कंटीली राहों का अब ही तो हुआ आगाज़ है |
.... मनोज मैहता..

Tuesday, 7 June 2016

उफ़ काश्मीर...!!

दूर तलक फैली हुई डल झील और चिनारों की मीठी हवा
बाग़े मुगल, शालीमार, निशाद, ज़न्नत है यह ज़मीं या ख़ुदा

गुलाबी लबों दुधिया चेहरों पर बिन मूँछ लहराती दाढ़ियां
सफेद कुर्तों पाजामों में क्या खूब फबें काश्मीरी बूढ़े जवां

काले चमचमाते लबादों पर लहरातीं वाह सफेद चुनरियां
बुर्कानशीं चेहरों से झाँकती महीन काले अब्रू व पुतलियां

हों सफीना, बेनज़ीर, सोफिया, सकीना मुमताज़- शाजिया
अल्लाह की रहमत-ऐ मेहर से लगती हैं सभी शहज़ादियाँ

यह हुस्न इतना नूर, श्रीनगर, पहलगांव ,गुलमर्ग जी हुज़ूर
अलसाई सी मदमदाई भी मगर ख़ौफज़दा सी ये वादियाँ

चेहरों पर बनावटी मुस्कानें, पेचीदा कातिलाना हावभाव
इधर भी शक उधर भी संशय, ये कहाँ खत्म होंगी दूरियां?

गफ़लतो या कि नफ़रतों की सब हदों को पार करती हुईं
चँद सियासती मक्कारियां और कुछ मज़हबी मजबूरियाँ

ज़न्नत को दोज़ख बना दिया, क्यूँ अल्लाह को भुला दिया
बंदूकें- बारूदी सुरंगें नज़राना देतीं, कब्रें और टूटी चूड़ियाँ

शिकारे, हाऊस बोटें, या कि चोटियों पर मशीनी घंडोले
छोड़िये बादामी अखरोटी, तमाम तिज़ारती जी हुज़ूरियां

केसर की खुशबू दबके रह गई इंसानी मांस की बदबू में
वज़ू वाले हाथ हैं लथपथ, लहूलुहान कर रहे हैं गुलिस्ताँ
.... मनोज मैहता..

उफ़ काश्मीर....!!

दूर तलक फैली हुई डल झील और चिनारों की मीठी हवा
बाग़े मुगल, शालीमार, निशाद, ज़न्नत है यह ज़मीं या ख़ुदा

गुलाबी लबों दुधिया चेहरों पर बिन मूँछ लहराती दाढ़ियां
सफेद कुर्तों पाजामों में क्या खूब फबें काश्मीरी बूढ़े जवां

काले चमचमाते लबादों पर लहरातीं वाह सफेद चुनरियां
बुर्कानशीं चेहरों से झाँकती महीन काली भवें व पुतलियां

हों सफीना, बेनज़ीर, सोफिया, या हों मुमताज़- शाजिया
अल्लाह की रहमत-ऐ मेहर से लगती हैं सभी शहज़ादियाँ

यह हुस्न इतना नूर, श्रीनगर, पहलगांव ,गुलमर्ग जी हुज़ूर
अलसाई सी मदमदाई भी मगर ख़ौफज़दा सी ये वादियाँ

चेहरों पर झूठी मुस्कानें पर पेचीदा कातिलाना हावभाव
इधर भी शक उधर भी संशय, ये कहाँ खत्म होंगी दूरियां

गफ़लतो याकि नफ़रतों की सब हदों को पार करती हुईं
चँद सियासती मक्कारियां तो कुछ मज़हबी मजबूरियाँ

ज़न्नत को दोज़ख बना दिया, क्यूँ अल्लाह को भुला दिया
बंदूकें- बारूदी सुरंगें नज़र करतीं, कब्रें और टूटी चूड़ियाँ

शिकारे, हॉऊस बोटें, याकि चोटियों पर खींचते हिंडोले
छोड़िये बादामी अखरोटी, तमाम तिज़ारती जी हुज़ूरियां

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...