न काफ़िये, न मिसरे न ही बहर पे जाईये ,
मेरे मतले के आक़िबत-ए-कहर पे जाईये |
उन्ह अख्ज़-ए-अग्यार से, मेरी है इल्तिज़ा ,
माशूका छीननीं है तो मिरे दहर पे जाईये |
अल्फ़ाज़ ही काफ़ी हैं, मेरे कत्ल के लिये ,
यार मेरे न यूँ ही, शीशी-ए-ज़हर पे जाईये |
आबे-चश्म के सैलाब में, मैं डूब जाऊँगा ,
मुर्दा जिस्म मेरा लेकर, न नहर पे जाईये |
इधर उधर पूछकर न वक्त ज़ाया कीजिये ,
मिलेगा खुद़ा वहाँ ही, अपने दर पे जाईये |
दौलत-ए-जहान, उसका दिल है मेरे लिये ,
भूखे ही मर जायेंगे, न मेरे ज़र पे जाईये ||
.. मनोज मैहता..
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