ध्यानमग्न से बैठे हो इसमें क्या कोई राज़ है,
वाकई अचंभित हो या महज़ इक अँदाज़ है?
बेचैनी को दिल की, लब कहने को हैं आतुर,
आँखें मगर बोल रहीं मन में जो अल्फ़ाज़ हैं|
हर सीनें में कोई ग़म, नासूर सा है फैल रहा,
असल में यह ज़ालिम ही, मर्ज़ का इलाज़ है|
हकीम बना जो बैठा है रोगे इश्क का माहिर ,
खुद इस बीमारी से हालत उसकी नासाज है |
बड़ा आगे बढ़ आये इस गफ़लत में न रहिये ,
कंटीली राहों का अब ही तो हुआ आगाज़ है |
.... मनोज मैहता..
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