Sunday, 31 July 2016

ऐसा तीर चलाया है...!!

मेरे दिल के अरमानों पर ऐसा तीर चलाया है
तूनें तेरे कर्म-ओ-सित्तम से मेरा दर्द बढ़ाया है

न जानें किन गुनाहों के मुझसे लिये हैं बदले
मैनें तो हरेक खुशी को, तेरे लिये ठुकराया है

यूँ इस दर-ओ-बज़्म में लाखों हैं इंतज़ारज़दा
मैंनें मेरी हसरतों को पर, पूरी तरह दबाया है

ज़िद है अब मैं दिल को, हर सूरत न मारूँगा
मुझसे जो आँखमिचौली करता मेरा साया है

वक्त-ए-हवस में वफ़ा का ज़िक्र ही बेमानी है
आज मेरे हालातों ने ये ही मुझे सिखलाया है
.                                     ... मनोज मैहता

Saturday, 30 July 2016

वहम में जिये जा रहे हैं..!!

कुछ लोग ऊँचे होने के वहम में जिये जा रहे हैं
अपने अहम से औरों को परेशाँ किये जा रहे हैं

लद तो गये है दिन पर अकड़ नहीं लदी उनकी
इसी ऐंठन के जामों को भर भर पिये जा रहे हैं

ख़ुद्दारी जिसके किरदार का हिस्सा है पैदायशी
उसी की हस्ती पर यारो तोहमतें दिये जा रहे हैं

माना कि मेहमान-ए-ख़सूसी हैं वो बड़े लोगों के
हम कहाँ उनका अज़ीम तोहफ़ा लिये जा रहे हैं

उतरे हुए ये शाही लिबास उन्हीं को हों मुबारक
हम तो शान से पतलून पे पैबंद सिये जा रहे हैं

ऐसे दीवाना बन कर एकटक न देख तू 'मनोज'
फड़ फड़ाने की मानीं कि बुझने दिये जा रहे हैं
                                            .मनोज मैहता

Sunday, 24 July 2016

कौन बेदिल मिल गया है!!

न सोच यह कि तेरे दाव से कोई गिरा या फिसल गया है
ऐ साज़िशों के शहँशाह वो तो बहुत आगे निकल गया है

ग़ुमाँ न कर तू पहुँच का तेरी यह सब वक्त का है करिश्मा
जिसको चाहा उठा दिया है जिसे भी चाहा निगल गया है

तुझ से पहले भी थी सियासत तेरी नहीं है कोई रियासत
जरा गौर से परख ले ज़ालिम तेरा सिंहासन हिल गया है

अपनों- बेग़ानों को आज़मा ले, धरे रहेंगे तेरे जाम- प्याले
कमअक्ल इसको भुना ले तुझको जो मौका मिल गया है

सुना था मनोज कि बाशरम था और रूह का भी नरम था
जिसने तुझको बदल डाला वोह कौन बेदिल मिल गया है
                                               ---     मनोज मैहता..

Sunday, 17 July 2016

नहीं करेगा!!

आँखें तक उठानें का तकल्लुफ़ नही करेगा ,
अब कभी भी यह दिल मुहब्बत नही करेगा |

उनकी शरारत-ए-मस्ती, वो उनकी शोखियाँ ,
अब तो ग़ुज़श्ता दौर की, हसरत नहीं करेगा |

जो कहते हैं मिलता नहीं कभी कू-ए-बुताँ में ,
उनको नज़र ख़ुदा कभी बहिश्त नहीं करेगा |

ज़ुन्नार कश्का सजाले या खतना करता फिर ,
सफ्फाक से कभी तेरी हिफाज़त नहीं करेगा |

पता है कि तेरा हसीन पैकर ढल भी जायेगा ,
'मनोज' मगर कहने की हिमाकत नहीं करेगा |
                                       
                                       --- मनोज मैहता

Tuesday, 12 July 2016

ख़ुदगर्ज सियासतदानों से...!!

अत्फ़ाल उन्हीं के निखरकर आये हैं उनके कारखानों से
उम्मीदें बिलकुल न रखिये इन ख़ुदगर्ज सियासतदानों से

भीड़ वहाँ इतनी थी लगी कि गुमान होता था मज़में का
पकवान फ़ीके ही खाकर लौटे यारो हम ऊँची दुकानों से

यह पैराहन-ए-रईसाना है अँदाज़- ए- नवाबी कातिलाना
हैवानियत की तीख़ी बू है उठती पर उनके रोशनदानों से

चाहे सरगर्म रहाे या सुस्ताये से पर बचना उनके साये से
अव्वल दर्जे के हैं वो दगाबाज़ दूरी रखना इन शैतानों से

हरेक अरज़ी पर साँपों की मानिंद लगा लेते है कुँडलियाँ
ओ अल्लाह बचाले हमको तू इन अश्किया हुक़्मरानों से

अब क्या लिखे या क्या बोले बेहतर है कि बस चुप होले
लहू टपककर जम गया, मनोज के शिकस्ता अरमानों से

                                                       -- मनोज मैहता

अत्फ़ाल.. बच्चे   पैराहन.. पोशाक  अश्किया.. क्रूर

नाम ऊँचा किया भी तो महज़ जुगाड़-ओ-इंतिख़ाब से

मलाल  सहर  को कि  न  मिल  सकी  कभी  आफ़ताब  से ,
तो  महरूम  रही  उधर  सुबह  भी,  दीदार -ए- महताब  से |

इन  दिनों  मिलावट  में  भी  मिलावट  लीजिये  लगी  होनें ,
हुये  हबक-ओ- ख़ुमार  दोनों  ही  गुम  बोतल-ए -शराब  से |

मुकाबला  हमारा  क्या  ख़ाक  करता  वो  सामने   आकर ,
नाम  ऊँचा  किया  भी  तो  महज़  जुगाड़- ए- इंतिख़ाब  से |

खर्चा  तालीम-ए- अत्फ़ाल  यूँ   इताब- ए-  अज़ाब  देता  है ,
आजिज़  सा  हो  जाता  हूँ  मैं  फकत नाम-ए- इंकलाब  से |

अब  तलक  भी  बदन  में  फफोलों  के  फटनें  के  हैं  निशाँ
उफ़  क्या  तीखी  लपटें  उठी  थीं  उस  शोला-ए- शवाब  से

ज़ाहिर-ए- जमाना  क्यों  कर  हुई  मेरी  व  उनकी  गुफ़्तगू ,
फ़कत  यही  तो  था  मालूम  करना,  मैहता  नें  ज़नाब  से |
                                                        ..मनोज मैहता

Sunday, 10 July 2016

मलाल हर किसी को है!!

मलाल सहर को कि न मिल सकी कभी आफ़ताब से ,
तो महरूम रही उधर सुबह भी, दीदार -ए-महताब से |

इन दिनों मिलावट में भी मिलावट लीजिये लगी होनें ,
हुये हबक-ओ-ख़ुमार दोनों ही गुम बोतल-ए-शराब से |

मुकाबला हमारा क्या ख़ाक करता, वो सामने आकर ,
नाम ऊँचा किया भी तो, महज़ जुगाड़-ए-इंतिख़ाब से |

खर्चा तालीम-ए-अत्फ़ाल यूँ इताब-ए- अज़ाब देता है ,
आजिज़ सा हो जाता हूँ मैं फकत नाम-ए-इंकलाब से |

अब तलक भी बदन में फफोलों के फटनें के हैं निशाँ ,
हाय क्या तीखी लपटें उठी थीं उस शोला-ए-शवाब से |

                                                       ..मनोज मैहता

Friday, 8 July 2016

Alas.. She went away!

   Not only this time
it happens every day
  now I've forgotten
when did we meet and stay
   I don't believe it
but comes one day
  my dreams will shatter
in gift, goodbye will you say
  when I used to fall asleep
sweetly you used to wake me
  now it's absconding
but you never do that play
  aimlessly I travel town to town
walk every street and lawn
  but don't find the destination
like beggar I have to stay
where should I go my queen
   tell me though I'm so mean
just see how without you
  I've become like dusty clay
O pen just stop writing
about loyalty or disloyalty
you kept flowing down
  with new friend she fled away

हम सब अपनी अपनी सलीब ढो रहे हैं

ख़्यालों के खेतो में ज्यूँ, तरकीब बो रहे हैं ,
हम सभी अपनी-अपनी, सलीब ढो रहे हैं |

गोलियाँ गटक के भी, अमीर जगा पड़ा है ,
कितने मज़े से देखो और, गरीब सो रहे हैं |

जिस घड़ी से पड़ा यह, दौलत का  लालच ,
उस ही घड़ी से दरअसल, नसीब रो रहे हैं |

लगता है नाम मेरा, होने लगा है कुछ- कुछ ,
जो छिटकते थे दूर कोसों, करीब हो रहे हैं |

बीजों की ऐसी नस्लें, इज़ाद कर दी गईं  हैं ,
इस दौर में सब ही महीनें, अबीब हो रहे हैं |

उनके हुस्न का जादू ऐसा चढ़ा है सिर पर ,
शबीब मैहता के भी अब, रकीब हो रहे हैं |
                                    --- मनोज मैहता

Thursday, 7 July 2016

O God...!!

know not wanders my soul
on which deck
why my breath appears
to hinder in neck
the friends whose company
I enjoyed lot
their presence now
induces in me wrath
on unknown land
all faces are unfamiliar
your memory sticks
with me like magnet
air is polluted with
sharp smell of libido
every person seems
aroused and erect
bodies are sold
openly in excitement
their violent red faces
are filled with lust
I'm helpless
in unworthy circumstances
my tearful eyes
are wetting the dry dust
God send some angel
to help me be out
It's not mine but
yours miracle's test
----   ----    -----    ----   -- Manoj Mehta

Wednesday, 6 July 2016

लिखता हूँ...!!

नहीं ज़हन में सैलाब कोई लानें के लिये लिखता हूँ ,
मैं तो बस आशिकों को मिलानें के लिये लिखता हूँ |

बैठे रहो हरदम पहलू में ही, यह तो हो नही सकता ,
मैं लौट कर ज़ल्द वापिस, आनें के लिये लिखता हूँ |

बिन पिये ही जहाँ पर, ख़ुमार सौ जामों का हो जाए ,
ऐसे एजाज़-ए-अज़ीम, मयखाने के लिये लिखता हूँ |

अशआर मिरे मुमकिन है, कभी आपको न हों भाते  
लफ्फाज़ी के ये हुनर, आज़माने के लिये लिखता हूँ |

ईसा-मूसा, अवतार-पैग्म्बर, गिरिजा, मस्ज़िदें- मंदिर ,
मैं बस मज़हबी उलझनें, मिटाने के लिये लिखता हूँ |

नफरत कभी भी मुहब्बत को यारो हरा नहीं सकती ,
मैं आप सभी में मुहब्बत, जगानें के लिये लिखता हूँ |

किसी भी जुबान का दोस्तो, बड़ा आलिम नही हूँ मैं ,
निज़ात ज़िगर के गुबार से, पानें के लिये लिखता हूँ |
----------------------- मनोज मैहता ----------------------

लिखता हूँ...!!

नहीं ज़हन में सैलाब कोई लानें के लिये लिखता हूँ ,
मैं तो बस आशिकों को मिलानें के लिये लिखता हूँ |

बैठे रहो हरदम पहलू में ही, यह तो हो नही सकता ,
मैं लौट कर ज़ल्द वापिस, आनें के लिये लिखता हूँ |

बिन पिये ही जहाँ पर, ख़ुमार सौ जामों का हो जाए ,
ऐसे एजाज़-ए-अज़ीम, मयखाने के लिये लिखता हूँ |

अशआर मेरे मुमकिन है, कभी आपको न हों भाते ,
ल्लफाजी़ के ये हुनर, आज़माने के लिये लिखता हूँ |
ईसा-मूसा, अवतार-पैग्म्बर, गिरिजा, मस्ज़िदें- मंदिर , मैं बस मज़हबी उलझनें, मिटाने के लिये लिखता हूँ | नफरत कभी भी मुहब्बत को यारो हरा नहीं सकती , मैं आप सभी में मुहब्बत, जगानें के लिये लिखता हूँ | किसी भी जुबान का दोस्तो, बड़ा आलिम नही हूँ मैं , निज़ात ज़िगर के गुबार से, पानें के लिये लिखता हूँ | ----------------------- मनोज मैहता -----------------------

लिखता हूँ...!!

नहीं ज़हन में सैलाब कोई लानें के लिये लिखता हूँ 
, मैं तो बस आशिकों को मिलानें के लिये लिखता हूँ |

 बैठे रहो हरदम पहलू में ही, यह तो हो नही सकता ,
मैं लौट कर ज़ल्द वापिस, आनें के लिये लिखता हूँ |

बिन पिये ही जहाँ पर, ख़ुमार सौ जामों का हो जाए , 
ऐसे एजाज़-ए-अज़ीम, मयखाने के लिये लिखता हूँ |

अशआर मेरे मुमकिन है, कभी  आप को न हों भाते , ल्लफाजी़ के ये हुनर, आज़माने के लिये लिखता हूँ | 

 ईसा-मूसा, अवतार-पैग्म्बर, गिरिजा, मस्ज़िदें- मंदिर , 
मैं बस मज़हबी उलझनें, मिटाने के लिये लिखता हूँ |

नफरत कभी भी मुहब्बत को यारो हरा नहीं सकती ,
मैं आप सभी में मुहब्बत, जगानें के लिये लिखता हूँ |

किसी भी जुबान का दोस्तो, बड़ा आलिम नही हूँ मैं , 
निज़ात ज़िगर के गुबार से, पानें के लिये लिखता हूँ | 
----------------------- मनोज मैहता -----------------------

बर्बाद हुये फिरते हैं...!!

तेरे हुस्न-ओ-इश्क में बर्बाद हुये फिरते हैं ,
ज़ख्मीं हैं फिर भी पर शाद हुये फिरते हैं |

जिनको कभी हमीं नें दी थी पनाह यारो ,
हमसे कहीं बेहतर आबाद हुये फिरते हैं |

उम्मीद किससे रखें, हम अब रहमतों की ,
ख़ास अपने ही तो ज़ल्लाद हुये फिरते हैं |

हम चाह कर भी यारो, बन न पाये वायज़ ,
मगर उनको देखिये सय्याद हुये फिरते हैं |

हमारी ख़्वाहिशों को यूँ कर रौंद डाला है ,
तब ही ज़लील-ओ-नामुराद हुये फिरते हैं |

रस-ए-ज़िंदगी दौड़ता है नसों में आपकी ,
हम सड़ते बदन में, मवाद हुये फिरते हैं |

तुम्हें लोग कहते हैं मस्त ब्यार का झौंका ,
हम ज़हन का बस, अवसाद हुये फिरते हैं |

अभ्र सा तेरा बदन किसी हूर से कम नहीं ,
हम तो मुरदार ग़र्द-ओ-दाद हुये फिरते हैं |
--------------- -- मनोज मैहता -- -------------

Friday, 1 July 2016

छोड़कर!!

वक्त निकल गया अपने चँद निशाँ छोड़कर ,
काश हम भी चले जाते, यह ज़हाँ छोड़कर |

अाजकल रातें रहती हैं जगमग करतीं हुईं ,
परवानें मदमस्त हैं, शमाँ-ए-शाम छोड़कर |

और भी तो काम हैं जग में इश्क के सिवा ,
लौट आया यूँ दीवाना यही पैगाम छोड़कर |

मेरी गज़ल में लगता है अब वो बात न रही ,
नही तो पढ़ते थे यार, तमाम काम छोड़कर |

बेताबियाँ ऐसी बढ़ी कि धड़कनें ही थम गईं,
ढूँढते हैं साकी को, नयनों के जाम छोड़कर |

दूरियाँ-नज़दीकियाँ न सीखे हम बारीकियाँ ,
मैहता घूमा महलों में, ढहता मुकाँ छोड़कर |
                                       .. मनोज मैहता

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...