आँखें तक उठानें का तकल्लुफ़ नही करेगा ,
अब कभी भी यह दिल मुहब्बत नही करेगा |
उनकी शरारत-ए-मस्ती, वो उनकी शोखियाँ ,
अब तो ग़ुज़श्ता दौर की, हसरत नहीं करेगा |
जो कहते हैं मिलता नहीं कभी कू-ए-बुताँ में ,
उनको नज़र ख़ुदा कभी बहिश्त नहीं करेगा |
ज़ुन्नार कश्का सजाले या खतना करता फिर ,
सफ्फाक से कभी तेरी हिफाज़त नहीं करेगा |
पता है कि तेरा हसीन पैकर ढल भी जायेगा ,
'मनोज' मगर कहने की हिमाकत नहीं करेगा |
--- मनोज मैहता
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