न सोच यह कि तेरे दाव से कोई गिरा या फिसल गया है
ऐ साज़िशों के शहँशाह वो तो बहुत आगे निकल गया है
ग़ुमाँ न कर तू पहुँच का तेरी यह सब वक्त का है करिश्मा
जिसको चाहा उठा दिया है जिसे भी चाहा निगल गया है
तुझ से पहले भी थी सियासत तेरी नहीं है कोई रियासत
जरा गौर से परख ले ज़ालिम तेरा सिंहासन हिल गया है
अपनों- बेग़ानों को आज़मा ले, धरे रहेंगे तेरे जाम- प्याले
कमअक्ल इसको भुना ले तुझको जो मौका मिल गया है
सुना था मनोज कि बाशरम था और रूह का भी नरम था
जिसने तुझको बदल डाला वोह कौन बेदिल मिल गया है
--- मनोज मैहता..
No comments:
Post a Comment