नहीं ज़हन में सैलाब कोई लानें के लिये लिखता हूँ ,
मैं तो बस आशिकों को मिलानें के लिये लिखता हूँ |
बैठे रहो हरदम पहलू में ही, यह तो हो नही सकता ,
मैं लौट कर ज़ल्द वापिस, आनें के लिये लिखता हूँ |
बिन पिये ही जहाँ पर, ख़ुमार सौ जामों का हो जाए ,
ऐसे एजाज़-ए-अज़ीम, मयखाने के लिये लिखता हूँ |
अशआर मिरे मुमकिन है, कभी आपको न हों भाते
लफ्फाज़ी के ये हुनर, आज़माने के लिये लिखता हूँ |
ईसा-मूसा, अवतार-पैग्म्बर, गिरिजा, मस्ज़िदें- मंदिर ,
मैं बस मज़हबी उलझनें, मिटाने के लिये लिखता हूँ |
नफरत कभी भी मुहब्बत को यारो हरा नहीं सकती ,
मैं आप सभी में मुहब्बत, जगानें के लिये लिखता हूँ |
किसी भी जुबान का दोस्तो, बड़ा आलिम नही हूँ मैं ,
निज़ात ज़िगर के गुबार से, पानें के लिये लिखता हूँ |
----------------------- मनोज मैहता ----------------------
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