वक्त निकल गया अपने चँद निशाँ छोड़कर ,
काश हम भी चले जाते, यह ज़हाँ छोड़कर |
अाजकल रातें रहती हैं जगमग करतीं हुईं ,
परवानें मदमस्त हैं, शमाँ-ए-शाम छोड़कर |
और भी तो काम हैं जग में इश्क के सिवा ,
लौट आया यूँ दीवाना यही पैगाम छोड़कर |
मेरी गज़ल में लगता है अब वो बात न रही ,
नही तो पढ़ते थे यार, तमाम काम छोड़कर |
बेताबियाँ ऐसी बढ़ी कि धड़कनें ही थम गईं,
ढूँढते हैं साकी को, नयनों के जाम छोड़कर |
दूरियाँ-नज़दीकियाँ न सीखे हम बारीकियाँ ,
मैहता घूमा महलों में, ढहता मुकाँ छोड़कर |
.. मनोज मैहता
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