Friday, 1 July 2016

छोड़कर!!

वक्त निकल गया अपने चँद निशाँ छोड़कर ,
काश हम भी चले जाते, यह ज़हाँ छोड़कर |

अाजकल रातें रहती हैं जगमग करतीं हुईं ,
परवानें मदमस्त हैं, शमाँ-ए-शाम छोड़कर |

और भी तो काम हैं जग में इश्क के सिवा ,
लौट आया यूँ दीवाना यही पैगाम छोड़कर |

मेरी गज़ल में लगता है अब वो बात न रही ,
नही तो पढ़ते थे यार, तमाम काम छोड़कर |

बेताबियाँ ऐसी बढ़ी कि धड़कनें ही थम गईं,
ढूँढते हैं साकी को, नयनों के जाम छोड़कर |

दूरियाँ-नज़दीकियाँ न सीखे हम बारीकियाँ ,
मैहता घूमा महलों में, ढहता मुकाँ छोड़कर |
                                       .. मनोज मैहता

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