Sunday, 31 January 2016

Sweet daughters...!!

पापा के मन को यूँ ही नहीं भाती हैं बेटियाँ
हर उत्सव की शोभा बस बढ़ाती हैं बेटियाँ

चिराग अगर घर के यारो, कहे जाते हैं बेटे
उन्हीं दीपकों का तेल और बाती हैं बेटियाँ

सूनें दिलों या घरों में रौनक है बस इन्हीं से
झोंपड़ों को भी राजमहल बनाती हैं बेटियाँ

माँ-बाबुल जब छोड़कर जाते हैं दुनिया को
उफ किस कद्र रोती और रुलाती हैं बेटियाँ

घर में खुशी का आलम, है इनके बिना नहीं
मन खिल उठे जब खिलखिलाती हैं बेटियाँ
----------------- मनोज मैहता ------------------

Monday, 25 January 2016

Yes.. Today is Republic Day

अपनी अपनी दौड़ है
लूटने की होड़ है
लहरा दिया है ध्वज
जनता पर है असहज
अधिकारों पर तो जोर है
कर्तव्य लेख हैं महज़
कहने को लोकतंत्र है
लोग पर परतंत्र हैं
ये ऊँची ऊँची कुर्सियां
सब लूटनें के यंत्र हैं
सचिवों की प्रधानता
कहां है जी समानता?
जलसों में भीड़ जुट रही
जम्हूरियत है लुट रही
दिखावे को देशभक्त हैं
यूँ सत्ता पर आसक्त हैं
मन में हरा या भगवा है
तिरंगे का दिखावा है
जय हिंद का शंखनाद
हमी से छलावा है
मौसम ग़मग़ीन नीरस है
जी हाँ आज गणतंत्र दिवस है
-------- मनोज मैहता ----------

Saturday, 23 January 2016

Don't make fake excuses...!!

बेकार बहाना न यह करो कि तबियत खराब है,
हमारी सूरत बुरी सही उनकी तो नीयत खराब है

शैतान बेचारा यूँ ही आज तक होता रहा बदनाम,
असल में हब्बा के जाये की आदमियत खराब है

हर चीज़ का दोष मद के मारों को देते रहे हैं जो,
उन्हीं मासूम दिखने वालों की सूफियत खराब है

पढ़ता रहा रँगीं किताब छुपाके कुर्राने शरीफ में ,
वो अब दावा करता है कायदे शरीयत खराब है

हालात के मारों का हर शख्स यहाँ लेता है मज़ा,
सच में ख़ुदा तेरी यह ज़मीने मिल्कियत खराब है
-------------------- मनोज मैहता ----------------------

Saturday, 16 January 2016

There is coldness in air but...!!

मौसम की ठंडक रिश्तों की गर्मी
भाई बहुत मुझे, तेरी ख़ुश्क नर्मी

उफ़! साफ दिखे आँखों में हबस
अच्छा लगे तुझमें अंदाज़े बेशर्मी

नाज़ुक है उम्र का ये दौरे जवानी
लहरायें ज़हन में ख्याल शबनमीं

रोंयें खड़े करे तेरे लबों की सुर्खी
चैनों करार लुटना तो है लाज़िमी

मुस्का कर अदा से निगाहें फेरना
मार डालेगी मुझे तेरी यह बेरहमी !
----------- मनोज मैहता ------------

Wednesday, 13 January 2016

लौह़ड़िया दी भ़याग...!!

बड्डी भारी ठंड ह़ै मइये, नौंह़णें जो मत बोलदी ,
बछाणें ते भ़्यागा ह़ी बा़र औणें जो मत बोलदी !

मांह़ मुँग्गां दी खिचड़ी ठैह़री के खाई लैंग्गा मैं  ,
बाझ़ी दात्तणीं रसयाल़ुयें,ओणें जो मत बोलदी !

राजड़यों गाई नें बिट्टियाँ, ठाल़ी दित्ता तोल़ा ह़ी ,
दिखयाँ मड़िये खीस्से ढलरोणें जो मत बोलदी !

तिज्जो पता ह़ै मिंज्जो,नजर ह़ै झ़ट्ट लगी जाँदी ,
नोह़ई ध़ोई त्यार ह़ोई, चमकोणें जो मत बोलदी !

नोंयें साल्लें मन्नयां सारयाँ नें ह़स्सी बोलना पौंद्दा .
दिख अपण कबल्ला ह़ी पल़चोणें जो मत बोलदी!!
----------------------- मनोज मैहता -------------------

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...