Sunday, 31 January 2016

Sweet daughters...!!

पापा के मन को यूँ ही नहीं भाती हैं बेटियाँ
हर उत्सव की शोभा बस बढ़ाती हैं बेटियाँ

चिराग अगर घर के यारो, कहे जाते हैं बेटे
उन्हीं दीपकों का तेल और बाती हैं बेटियाँ

सूनें दिलों या घरों में रौनक है बस इन्हीं से
झोंपड़ों को भी राजमहल बनाती हैं बेटियाँ

माँ-बाबुल जब छोड़कर जाते हैं दुनिया को
उफ किस कद्र रोती और रुलाती हैं बेटियाँ

घर में खुशी का आलम, है इनके बिना नहीं
मन खिल उठे जब खिलखिलाती हैं बेटियाँ
----------------- मनोज मैहता ------------------

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...