पापा के मन को यूँ ही नहीं भाती हैं बेटियाँ
हर उत्सव की शोभा बस बढ़ाती हैं बेटियाँ
चिराग अगर घर के यारो, कहे जाते हैं बेटे
उन्हीं दीपकों का तेल और बाती हैं बेटियाँ
सूनें दिलों या घरों में रौनक है बस इन्हीं से
झोंपड़ों को भी राजमहल बनाती हैं बेटियाँ
माँ-बाबुल जब छोड़कर जाते हैं दुनिया को
उफ किस कद्र रोती और रुलाती हैं बेटियाँ
घर में खुशी का आलम, है इनके बिना नहीं
मन खिल उठे जब खिलखिलाती हैं बेटियाँ
----------------- मनोज मैहता ------------------
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