मौसम की ठंडक रिश्तों की गर्मी
भाई बहुत मुझे, तेरी ख़ुश्क नर्मी
उफ़! साफ दिखे आँखों में हबस
अच्छा लगे तुझमें अंदाज़े बेशर्मी
नाज़ुक है उम्र का ये दौरे जवानी
लहरायें ज़हन में ख्याल शबनमीं
रोंयें खड़े करे तेरे लबों की सुर्खी
चैनों करार लुटना तो है लाज़िमी
मुस्का कर अदा से निगाहें फेरना
मार डालेगी मुझे तेरी यह बेरहमी !
----------- मनोज मैहता ------------
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