1998 यकीनन ही सौभाग्यशाली वर्ष था
पुरानी वर्जनायें टूटने का सभी को हर्ष था
नगरोटा के मुख पर अनूठी कांति आई थी
बाली के रूप में महानत्तम क्रांति आई थी
तत्पश्चात तेज गति से क्षेत्र में हुआ विकास
नगरोटा के अंधियारों में फैला तीव्र प्रकाश
पहली ही पारी में बाली ने इरादे स्पष्ट किये
दुश्मनों के मंसूबे कठिनश्रम से ध्वस्त किये
विगत सारे सालों का क्षोभ खेद मिटा डाला
चँगर और पलम का संपूर्ण भेद मिटा डाला
2003 नें तो सब कुछ ही ख़ास बना डाला
62 प्रतिशत मत देकर इतिहास बना डाला
आभा तब और बढ़ी जब मन्त्री बने बाली
नगरोटा की धमक दिल्ली तक पहुंचा डाली
अपनी कार्य शैली से ऊँचा झंडा गाढ़ दिया
घाटे वाले निगमों को संकट से उबार दिया
नगरोटा के विकास में भर भर लाये थैली
टाँडा- हॉस्पीटल की ख्याति चहुँ और फैली
कई जुगों से बाधित कार्यों को करवा डाला
इलाके में सरकारी कॉलेज भी बनवा डाला
मगर अभी तो करना था पूरा रुत्वा हासिल
इस ही क्रम में नगरोटा में बनीं नई तहसील
2007 के चुनाव तो कांग्रेसियों को मार गये
आस पास के सभी दिग्गज बाज़ी हार गये
मगर नगरोटा ने बाली पर ही विश्वास किया
उसी को चुना जिसने उनका विकास किया
विपक्ष में बैठ कर भी रास्ते पर अडिग रहे
राजनैतिक उत्पीड़न पे भी बाली सजग रहे
सारे हिमाचल में फिर ख़ुद की धूम मचा दी
रोजगार संघर्ष यात्रा कोने कोने में पहुंचा दी
हाई कमान ने भी तो पूरी पूरी तरफदारी की
घोषणापत्र लिखने की उनको जिम्मेदारी दी
2012 मे नगरोटा को कुरूक्षेत्र बना डाला
दिग्गजों नें तन मन धन पानी सा बहा डाला
पर सभी षडयंत्रकारियों का सूर्य अस्त हुआ
उनका करिंदा भी बाली के आगे पस्त हुआ
तमाम अटकलों अफवाहों को झुठला डाला
रिपुओं के मुखों को शांति से कुम्हला डाला
राजनैतिक वरिष्ठता मे झट से ऊपर उठ गये
जले तो बड़े विरोधी अंदर ही अंदर घुट गये
ट्रांस्पोर्ट, तकनीकी शिक्षा साथ और आपूर्ति
तीनों ही महकमों में उत्पन्न करदी नई स्फूर्ति
परिवहन के बेड़े में अलग सी नई बसें डालीं
क्षेत्र में इंजिनीयरिंग कॉलेज भी लाये 'बाली'
मस्सल में सुंदर भवनों का निर्माण करवाया
विकास की हवा नही पूरा ही तुफान चलाया
नगरोटा ने सत्य में बुलंदी का आकाश छुआ
मिनी सचिवालय का भी शिलान्यास हुआ
Friday, 28 October 2016
नगरोटा विकास गाथा
Wednesday, 26 October 2016
बोलता तेरा काम है... !! !!
यूँ ही नहीं तेरा हर इक जुबाँ पर नाम है,
तू तो चुप रहता पर बोलता तेरा काम है|
तेरे साथी तो फरमाते हैं चैन-ओ-आराम,
सामने तेरे मगर ये अल्फ़ाज़ ही हराम हैं|
स्वाद में कड़वा सही असर मीठा है बड़ा,
या ख़ुदा किस नायाब मदिरा का जाम है|
किसीको ख़ुश करने को देते जो गालियाँ,
मन-ओ-मगज से तुझको करते सलाम हैं|
तेज़ी से डरा है या अँदाज़ से जल मरा है,
बस क़ातिलना तेरा यह तर्ज़-ए-ख़िराम है|
.. मनोज मैहता
किस्माँ.. .. !! !!
घ़िरथ बाहती चाह़ंग गलांगे
दस्सा पूरा पता किंह़िंया लाँग्गे
ओआ गप्पां- गप्पां सिखिये
सारियां ह़ी जे किस्मां लिखिये
घ़रघ़याल़ू, टौपू,छौरे,द्रँगाल़,
साकड़े, दबकू,चीमड़े घंडवाल़
पखलू, लीले, गाह़ले, घटवाल़,
मल़ाँच, बड़जात्ये, पत्रवाल़
बणचर, लाकड़िये, पटियाले़ ,
लौदरी,बराड़,भ़ाटे ता कजले़
खट्टे, जगोतरे, मुंगरे, सैह़रिये ,
नन्दे, चुपड़े, डब्बे, भनायरिये
चँघड़, तौसे, जौहड़, भड़वार,
कलमाड़ी, मारकर, मोर मार
मुरैणे, समौऊ, फनार, नल़ौऊ,
डींग,जमनियाल़ कनें घड़ऊँ
न्ह़्ल़ेटु, बगोतरे, पाँजले, क्रोंक,
बाह़्ड़ी, धनोटिये,बैद,भ़ल़ौंच
अँगारिये, दल़वाँच, शँडियाल़
बगूड़े, ध़्रोंच, मींड्डे, कठियाल़
फ़रेटू,स्याल़,चीमड़े,मनियाल़ू
रैंगणियें,मड़दांण तां नरियाल़ू
भ़ूत, नाग, बलाह़रू, डगयाल़ू
फिड्डु, कैंदल़ कने बगियाल़ू
कोई खपरु कोई जोखणूं रौड़ू
साकी,चड़ेलू, राख्खे, खोड़ू
चीमड़े, रैंसू, मसँद, मनियाल़ू,
दलबाड़च, कुड़याल़े, सराल़ू
हल्ली भी छुटी गये मते यारो
इत्णेयां ने ह़ी तुसां कम सारो
याद जे ह़ोर तुसां जो ओंग्गे
तां मैह़ते जो रिंग इक मारो
Sunday, 23 October 2016
ओ नौजवानों... !! !!
ह़िमाचले देयो नौजवानों कुस बख्खे तुसाँ खिट लगाईयो
दारुआ दियाँ तां गप्पाँ ह़ी छड्डा चप्पें चप्पें भँग्ग पुजाईयो
पूल कनें स्नूकर बस बह़ानें, चुणी लेयो मेयो नोयें ठकाणें
सारा ह़ाल ध़ुँएं ने भ़रोया समैका दी जिंह़ियां ध़ूणीं पाईयो
बेसबॉला दे बैटाँ फसाई सौए दिया स्पीडा बाईकाँ दौड़ाई
सौ ग्राम मास नीं चुतड़ाँ च, बेह़ली कजो बदमासी पाईयो
ह़ाँखीं दे तां कलोडु चढ़यो खाड्डु चमड़िया अँदर बड़यो
ह़ैगरे लगदी कमीज टंगोईयो जल़ी जीन ए़ कुथु फसाईयो
माऊँ बब्बाँ पासे तां दिख्खा कजो बणा दे खोटा सिक्का
खून परसीने दी गाढ़ी कमाई, कजो नशयाँ बिच उड़ाईयो
पागलाँ जो जेह़ड़ी दवाई लाँदे, तिन्हाँ कैप्सूलाँ तुसाँ खाँदे
तुह़ाड़ेयाँ पुठ्ठे कम्माँ जो दिख्खी, देवभ़ूमि बड़ी शरमाईयो
मोटरसैक्लाँ लोआह़ी दै दे या फँदयाँ गल़ेयाँ च लाई लै दे
जींदे जी असाँ मरी चल्ले ऐसी कजो तुसाँ अग्ग लगाईयो
..मनोज मैहता
Friday, 21 October 2016
कजो पाया तैं मैह़ता नोट्टाँ दा खलार ह़ै... !!
ठँडी ठँडी बझ़ौणा लग्गी पाणियें दी ध़ार ह़ै
सीह़म बगया नक्के ते कनें चढ़या बुखार है
मत करा बेह़ली चिंता सब ठीक ह़ोई जाणां
ह़ै नीं एह़ बमारी कोई बस मौसमें दी मार ह़ै
कजो नेताजी दे गोड्डे तुसाँ जिकादे भ़ाऊओ
इन्ह़ांदे अपणें मुँड्डे पर लटकोईयो तलवार ह़ै
किंह़ियाँ कि पंछैणनें ह़ुण जागत ताँ बिट्टियाँ
मुछ्छाँ भ़ी रख्खियाँ कनें लाईयो सलवार है
ताजे समाचार कैस बिच पढ़िये या दिख्खिए
नँग्गिंयां बस फोटुआँ ने भरोईयो अखबार है
बगानियाँ लाड़ियाँ जो कजो टूरी टूरी दिखदा
कद्दई छैल़ मोआ तेरिया जणासा दी नुह़ार है
दूंह़ं त्रीं फुल्कुआँ खाई रज्जी जे जाँदा ढिड्डड़ू
कजो पाया तैं मैह़ता एड्डा, नोट्टाँ दा खलार ह़ै
Thursday, 13 October 2016
'जियो' तुम जियो.... !! !!
रिलायंस की जियो सिम ने यारो धूम मचा दी है
एयरटैल व बाकियों की सच ही नींद उड़ा दी है
नैट फ्री देकर मक्खियां मारने पर मजबूर किया
बहुत लूटने वालों का हर इक सपना चूर किया
मुँहमाँगे दामों पर नैट की जी.बी. बेचा करते थे
कॉल टाईम,पावर जाने क्या क्या चेपा करते थे
जबसे आ गई है जियो भ्रामक प्रचार चलाया है
बड़ी हानिकारक है ऐसा हल्ला कुछ फैलाया है
ऑरेंज हो या फिर ब्लयू हम को तो बस लेनी है
और दिल से दुआएँ मुकेश अम्बानी को देनी हैं
बिजनेस टैक्टिक्स प्रिय आप भी इस्तेमाल करो
तीन महीने ही सही पब्लिक को खुशहाल करो
एक गुज़ारिश परन्तु हमने रिलायंस से करनी है
फॉरमेल्टीज़ ढेर सारी क्या तनिक कम करनी हैं ?
.. मनोज मैहता
Tuesday, 11 October 2016
चाहतों के पर भी कटा डाले
मुहब्बत और उल्फ़त के वरके ही मिटा डाले
हमने तो अपनी चाहतों के पर भी कटा डाले
काँटे जो बिखरे पड़े थे तेरी राहों में बे हिसाब
दामन मे समेट कर मैंने, लो वो सब हटा डाले
हरिक बात मेरी पर तुम जिन्हें बुड़बुड़ाती हो
किसने तुम्हें फ़ुसला कर ये गँदे हर्फ़ रटा डाले
अश्शाक नामुराद भला कहाँ मानेगे मेरी बात
कि हसीनाओं नें शाहों से भी तलवे चटा डाले
छोड़ दीजे कुरेदना अब तो उसके ज़ख़्माें को
'मैहता' ने सभी ग़म ख़ुद के सीने से सटा डाले
.. मनोज मैहता
फकोया लकड़ू घ़रे यो ल्योणां ,
बोल्लया चोर नी कद्धी ओणां |
तोप्पा दे लोक्काँ बिच पाप्पाँ ,
अपणा मैल कुनीं मेयो ध़ोणां |
बाह़रके राबणे फूकणां लगयो ,
अन्दरे आल़ा कुत्थु फकोणा |
बगाने दी लाड़ी सीता लगदी ,
अपणी ताड़का लगी बझ़ोणा |
राम जी डोल ह़ी दड़ी रेह़न्यों ,
लछ्मणें अज घुट लाई ओणां |
थौह़ें जानयों तुसां भ़ीड़ा बिच ,
नह़ीं तां बटुआ गोआई औणां ,
बड़ा मत फणसोयें बो राम्मां ,
जानकिया नक बढाई औणां ||
..मनोज मैहता
Saturday, 8 October 2016
खर्चे आल़ा म्ह़ीना...!!
छल्लियाँ दे ता रही गै गुल्लु पर ध़ान ह़ुण पकणां लग्गे
श्राद्धाँ ते मसे जे गै छुड़की नवरातरे मुँड्डे कढणां लग्गे
मौसम भी बदलोंदा आया, रती रती ठंड लगी बझ़ोणां
रात्तीं किछ लम्मियाँ ह़ोईयाँ ध़्याड़े दिख्खा घटणां लग्गे
गाँधी जयँती मसें म्या बीती ठेकेदारें दारू मँह़गी दित्ती
माईके दी वाज सुणींने सब रामलीला जो ऩठणां लग्गे
नारद मोह़ ते पृथ्वी पुकार खब नीं कैस गलाँदे बो यार
स्टेज सैक्ट्री माईके फकड़ी जोरें नें किच्छ पढ़ना लग्गे
ध़ान्नां दी जाह़लु चली कटाई, जणासाँ मर्दाँ गई थकाई
खाली बैठ्ठयों मीटे वाल़े, भ़ार कुक्कड़ाँ दे बध़णां लग्गे
गाह़्ंणी दा कम्म जे पोणां, बजार फिरी ते मँदा ह़ोणा
फिलह़ाल तां फैणियां अाले़ आट्टा पैरां ने मथणा लग्गे
बंग्गाँ, पराँदू, छक्कु सीसे खाली ह़ोणें सबनीं दे खीस्से
करवाचौथ जे आया नेड़े जणासां दे भ़ाअ बध़णा लग्गे
अपण ह़ल्ली रती कि ठह़रा, पह़लैं ओणां मेयो दसह़रा
अक्तूबर मह़ीना उंह़िंयाँ ठँडा, मुँह़ मर्दां दे भ़खणा लग्गे
तीह़ां तरीकाँ आई दयाल़ी, जेबाँ उध़डियाँ ह़ोयो खाली
ड्राई- फ्रूट कनें मठयाईयाँ, बुरे ह़ाखीँ मेयो लगणा लग्गे
.. मनोज मैहता
Thursday, 6 October 2016
गद्दी छैल़ तां गद्दण सोह़णी
ह़त्थे लाँदयाँ ह़ी मैली ह़ोणी
लौह़णां लग्गे पह़ाड़ाँ जोत्तां
ह़ुण गद्ध़ेरने बर्फ जे पोणी
बुन्ह़ं औंदयाँ ह़ी मेल़े लगणेंँ
बूचरां ह़रिक, छेल्ली टोह़णी
मीट, नरासे, मुँड्डी तां टुंड्डियां
मेस्से दी लग्ग, कीमत पोणी
भ़ेड़ तां भ़ेड्डू डगणा भ़ी पोणे
तां जाई मितरो, उन्न कतोणी
लबा लब भ़रोयो ह़न्ड्डू पारू
कुथु रखणा, ह़ुण दुध़- नौणी
दसह़रा तनीं दिखणां मिलना
अपण दयाल़ी, बुन्ह़ं मनोणी
..मनोज मैहता
वाह बो गद्दणी
Tuesday, 4 October 2016
निभाई हैं वफ़ादारियाँ...!!
उम्र भर दिल से निभाई हैं हमनें वफ़ादारियाँ
उनको जाने क्यों कर लगींं मगर ये गद्दारियाँ
आज के इस वक़्त में फासले से करिये बात
ग़र करीब बड़े जाओगे मिट जायेंगी यारियाँ
उनका नाम उन्हींका काम तू क्यूँ बने बावरा
उनकी मिट्टी उनकी ख़ाद उनकी है क्यारियाँ
यार तू ठहरा गदागर उनको चाहिये सौदागर
भाड़ में जायें सब तेरीं मेहनत-ओ-खुद्दारियाँ
राख़ से यूँ बदतर है तू पर मौजूद है कू-ब-कू
समझा नही 'मैहता' तुझे, भूल ग़म ख़्वारियाँ
.. मनोज मैहता
भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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🌺 भृगु-वंश महाकाव्य गान 🌺 नारी-पक्ष बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती, ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती। बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की दे...
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--- ग़ज़ल चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त। किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया, मगर न थमी ...