उम्र भर दिल से निभाई हैं हमनें वफ़ादारियाँ
उनको जाने क्यों कर लगींं मगर ये गद्दारियाँ
आज के इस वक़्त में फासले से करिये बात
ग़र करीब बड़े जाओगे मिट जायेंगी यारियाँ
उनका नाम उन्हींका काम तू क्यूँ बने बावरा
उनकी मिट्टी उनकी ख़ाद उनकी है क्यारियाँ
यार तू ठहरा गदागर उनको चाहिये सौदागर
भाड़ में जायें सब तेरीं मेहनत-ओ-खुद्दारियाँ
राख़ से यूँ बदतर है तू पर मौजूद है कू-ब-कू
समझा नही 'मैहता' तुझे, भूल ग़म ख़्वारियाँ
.. मनोज मैहता
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