मुहब्बत और उल्फ़त के वरके ही मिटा डाले
हमने तो अपनी चाहतों के पर भी कटा डाले
काँटे जो बिखरे पड़े थे तेरी राहों में बे हिसाब
दामन मे समेट कर मैंने, लो वो सब हटा डाले
हरिक बात मेरी पर तुम जिन्हें बुड़बुड़ाती हो
किसने तुम्हें फ़ुसला कर ये गँदे हर्फ़ रटा डाले
अश्शाक नामुराद भला कहाँ मानेगे मेरी बात
कि हसीनाओं नें शाहों से भी तलवे चटा डाले
छोड़ दीजे कुरेदना अब तो उसके ज़ख़्माें को
'मैहता' ने सभी ग़म ख़ुद के सीने से सटा डाले
.. मनोज मैहता
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