Monday, 28 December 2015

Panchayati election days...!!!

सजग रहिये दोस्तो, पँचायती चुनावों के दिन हैं ,
झूठे भाषणों, मुस्कुराहटों व दिखावों के दिन हैं !

सारी उम्र अकड़ में काटी हैं अब सलाम कर रहे,
फिर सिर पर आ चढ़ेंगे, चँद झुकावों के दिन हैं !

खुदी में मस्त रहिये, सुनकर भी कुछ न कहिये,
उनके उलझनों या मानसिक तनावों के दिन हैं !

काम जिसने है किया बस उसको दीजिए दुआ,
संतुलन बनाये रखिये मन का दबावों के दिन हैं !

हाजमा और सेहत इकदम चुस्त दुरुस्त रखिये ,
मुर्ग- मुसल्लमों, दावतों और शराबों के दिन हैं!!
------------------ मनोज मैहता ---------------------

Monday, 21 December 2015

The hopes of heart are shattered..!!

नामुराद दिल के सारे अरमान टूटे हैं ,
कुछ दिनों से इसके मेहरबान रूठे हैं !

यूँ तो दिखाने को बनते हैं पाक साफ ,
असल में उन्होंनें कई कद्रदान लूटे हैं !

आँखें खुश्क हो गईं, खामोश है ज़ुबाँ ,
जब से इश्क़ के साज़ो सामान छूटे हैं !

अँधेरा और गहरा गया मेरे आसपास ,
जिस दिन से घर के रोशनदान फूटे हैं !

कहना तो चाहा मगर कह न पाया मैं ,
कि उनके सभी मुरीद,चाहवान झूठे हैं !!
---------------- मनोज मैहता ---------------

Saturday, 19 December 2015

Panchayati Raj....!!

दरअसल दोनों को इन दिनों, वोटों की दरकार है ,
कल तक जो जानी दुश्मन थे आज पक्के यार हैं !

प्रधानी इक है लड़ रहा तो दूजा समिति भिड़ रहा ,
मनरेगा का पैसा हड़पनें को पर दोनों ही तैयार हैं !

जातीय समीकरण भी, हैं बिलकुल उनके हक में ,
अपनें अपनें वर्ग के तो दोनों ही स्वयंभू सरदार हैं !

पँचों व उपप्रधानों की तो मानों बाढ़ ही है आई हुई ,
हर इक को भरोसा दे रहे कि हम तो तेरे ही यार हैं !

जिला परिषद की सीट महिला को है आरक्षित हुई ,
इस बात से दोनों के सिर से, घट गया तमाम भार है !

किराये की टैक्सियों में, बहुतेरा सफर है कर लिया ,
खरीद पर्सनल गाड़ी हमनें, लेनी जी अबकी बार है !!
------------------------ मनोज मैहता ---------------------

Thursday, 3 December 2015

Now I enjoy nothing ....!!

शेर और गज़लें लिखनें में पहले सा मज़ा नहीं रहा ,
तेरी सूरत पे मर मिटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !

कौड़ियों के भाव से कभी , बोली अपनी लगती थी ,
करोड़ों में अब बिकनें में, पहले सा मज़ा नहीं रहा !

झलक सनम की पानें को , जहाँ बैठा करते थे घँटों ,
दो घड़ी भी वहाँ टिकनें में , पहले सा मज़ा नहीं रहा!

छू लेने भर से ही तुमको, रोम रोम खिल उठता था ,
अब सीने से भी चिपटने में, पहले सा मज़ा नहीं रहा!

तेरे बहुत समझाने पर मैं थोड़ा सँकुचाया करता था ,
खुद चादर में सिमटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !!
----------------------- मनोज मैहता -----------------------

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...