शेर और गज़लें लिखनें में पहले सा मज़ा नहीं रहा ,
तेरी सूरत पे मर मिटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !
कौड़ियों के भाव से कभी , बोली अपनी लगती थी ,
करोड़ों में अब बिकनें में, पहले सा मज़ा नहीं रहा !
झलक सनम की पानें को , जहाँ बैठा करते थे घँटों ,
दो घड़ी भी वहाँ टिकनें में , पहले सा मज़ा नहीं रहा!
छू लेने भर से ही तुमको, रोम रोम खिल उठता था ,
अब सीने से भी चिपटने में, पहले सा मज़ा नहीं रहा!
तेरे बहुत समझाने पर मैं थोड़ा सँकुचाया करता था ,
खुद चादर में सिमटने में , पहले सा मज़ा नहीं रहा !!
----------------------- मनोज मैहता -----------------------
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