सीनें में जवाँ सा जोश भी है तबियत में और उल्लास भी है,
चँद भूली बिसरी घड़ियों की कड़ियाँ जुड़नें की आस भी है.
तेरा मुझको देखके यूँ खिलना,फिर झट गले से आ मिलना,
मेरी सजनी ऐसा लगता है ज्यों जारी अपना मधुमास ही है.
कुदरत ने खेल रचाया था, क्यों दिल से दिल उकताया था,
भूल गई हो तुम वो काला युग, ऐसा मुझको विश्वास भी है.
तुमने सँभाला ही नहीं मुझको बल्कि सँवारा भी है मुझको,
कुछ भी नहीं हूँ मैं भुला पाया, ख़ताओं का अहसास भी है.
यकीनन मेरे इन अल्फाज़ों, से बेकाबू हुई तेरी साँस भी है,
जिन मस्त मौज़ों पे तैरे हैं, हर बार ही उनकी तलाश भी है..
-------------------------मनोज मैहता--------------------------
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