नफरतों की सब ही हदें लाँघता है ,
कोई मेरी मौत की दुआ माँगता है ।
उसकी सनक है या तुनकमिजाज़ी?
छोड़कर उँगली, गिरेबान थामता है ।
दिखावट को यूँ तो बनता है बेचारा ,
असल में है क्या, वो ख़ुद जानता है ।
जिसकी नज़र में , कभी मैं ख़ुदा था,
आज वोही मुझको शैतान मानता है ।
महलों में रहना जिसे बहुत पसंद था,
आजकल कूचों की ख़ाक छानता है ।।
-------------मनोज मैहता -----------------
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