लो ज़िंदगी की एक और जिम्मेदारी निपट गई,
गुजश्ता दौर की चँद यादें जिगर से लिपट गईं ।
बढ़ गई थीं दूरियाँ यकीनन जो हमारे दरम्यान,
बालू के पहाड़ सी वो इक ही पल में मिट गईं ।
ख़ूब भटके हम बेख़ौफ,बेधड़क बियावानों में ,
हस्ती मगर हर बार तेरे, इर्दगिर्द ही सिमट गई ।
यूँ नहीं कि खुशी देने की तुझे मेरी मँशा न थी ,
बदहाली- तँगदिली जरा, थी मुझसे चिपट गई ।
तू जो खुश है तो मैं भी बेफिक्र हुआ फिरता हूँ ,
छोड़ चिंता को कि कोई और है मेरे निकट हुई ।
------------------ मनोज मैहता -------------------
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